भावार्थ : — इन्द्रियोना विषयोमां एवो कोई पण विषय नथी के जे आत्माने हितकारी होय, तेम छतां अज्ञानी बहिरात्मा, अनादिकाळना अविद्याना संस्कारने लीधे, तेमां रति करे छे – आसक्त रहे छे.
इन्द्रिय – विषयोनुं सुख ते सुख नथी. वास्तवमां ते दुःख छे, कारण के ते पराधीन छे, आकुळतावाळुं छे, अस्थिर छे, क्षणभंगुर छे, विच्छिन्न छे, परिणामे दुःसह छे अने बंधनुं कारण छे;१ तेम छतां अनादि मिथ्यात्वना संस्कारवश अज्ञानी तेनी रुचि करे छे अने तेनी प्राप्ति माटे चिंता करी रातदिन तेनी पाछळ लाग्यो रहे छे.
विषयो हितकारी के सुखदायी नथी. तेओ ‘अकिंचित्कर’ छे. ‘‘संसारमां के मोक्षमां आत्मा पोतानी मेळे ज सुखरूप परिणमे छे; तेमां विषयो ‘अकिंचित्कर’ छे अर्थात् कांई करता नथी. अज्ञानीओ विषयोने सुखनां कारण मानीने नकामा तेमने अवलंबे छे.’’२
‘‘जेमने विषयोमां रति छे, तेमने दुःख स्वाभाविक जाणो; कारण के जो दुःख (तेमनो) स्वभाव न होय तो विषयार्थे व्यापार न होय.’’३
‘‘अज्ञानी बाह्य इन्द्रियोना विषयोमां सुख माने छे, तेना ग्रहणनी निरंतर इच्छाथी सदा आकुलव्याकुल रहे छे. आ आकुळतानुं दुःख तेने केटलीक वखत एटलुं असह्य लागे छे के विषय ग्रहण करवाना प्रयत्नमां कदाच मृत्युने भेटवुं पडे तो पण तेनी दरकार करतो नथी. ए बतावे छे के मृत्युना दुःख करतां आकुळतानुं दुःख वधारे छे.’’४
ए रीते इन्द्रियोना विषयोमां वास्तविक सुख नहि होवा छतां, अनादि अविद्याना संस्कारने लीधे अज्ञानी तेमां रत रहे छे. ५५. १. जुओ – श्री प्रवचनसार गाथा – ७६ अने टीका – भावार्थ (गु. आवृत्ति)
जे इन्द्रियोथी लब्ध ते सुख ए रीते दुःख ज खरे. (७६)
२. श्री प्रवचनसार – गा. ६नो भावार्थ. ३. विषयो विषे रति जेमने, दुःख छे स्वभाविक तेमने;
४. जुओः मोक्षमार्ग प्रकाशक – गु. आवृत्ति पृ. ५१.