Samadhitantra-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 60.

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समाधितंत्र१०९

बोधितेऽपि चान्तस्तत्त्वे बहिरात्मनो न तत्रानुरागः सम्भवति मोहोदयात्तस्य बहिरर्थ एवानुरागादिति दर्शयन्नाह

बहिस्तुष्यति मूढात्मा पिहितज्योतिरन्तरे
तुष्यत्यन्तः प्रबुद्धात्मा बहिर्व्यावृत्तकौतुकः ।।६०।।

टीकाबहिः शरीराद्यर्थे तुष्यति प्रीतिं करोति कोऽसौ ? मूढात्मा कथम्भूतः ? पिहितज्योतिर्मोहाभिभूतज्ञानः क्व ? अन्तरे अन्तस्तत्त्वविषये प्रबुद्धात्मा मोहानभिभूतज्ञानः अन्तस्तुष्यति स्वस्वरूपे प्रीतिं करोति किं विशिष्टः सन् ? बहिर्व्यावृत्तकौतुकः शरीरादौ निवृत्तानुरागः ।।६०।।

आत्मस्वरूपनो बोध आपवा छतां बहिरात्माने तेमां अनुराग संभवतो नथी; मोहना उदयथी तेने बाह्य पदार्थमां ज अनुराग होय छेएम दर्शावतां कहे छेः

श्लोक ६०

अन्वयार्थ :(अन्तरे पिहितज्योतिः) अंतरंगमां जेनी ज्ञानज्योति मोहथी आच्छादित थई गई तेवो (मूढात्मा) बहिरात्मा (बहिः) बाह्यमां एटले शरीरादि पर पदार्थोमां (तुष्यति) संतुष्ट रहे छेअनुराग करे छे; परंतु (प्रबुद्धात्मा) जेने स्वरूपविवेक जागृत थयो छे तेवो अन्तरात्मा (बहिर्व्यावृत्तकौतुकः) बाह्य शरीरादि पदार्थोमां कौतुक (अनुराग) रहित थई (अन्तः) अंतरंग आत्मस्वरूपमां (तुष्यति) संतोष करे छे.

टीका :बाह्यमां एटले शरीरादि पदार्थमां ते संतोष करे छेप्रीति करे छे. कोण ते? मूढात्मा (बहिरात्मा). ते केवो छे? जेनी ज्योति ढंकाई गई छे, अर्थात् मोहथी जेनुं ज्ञान पराभव पाम्युं छे. क्यां? अंतरंगमां एटले अर्न्ततत्त्वना विषयमां. प्रबुद्धात्मा एटले जेनुं ज्ञान मोहथी अभिभूत थयुं नथी (पराभव पाम्युं नथी) तेवो (आत्मस्वरूपमां जागृत) आत्मा, अंतरंगमां संतोष करे छेस्वस्वरूपमां प्रीति करे छे, केवो थईने? बाह्यमां कौतुकरहित थईनेशरीरादिमां अनुरागरहित थईने (आत्मस्वरूपमां प्रीति करे छे).

भावार्थ :ज्ञानीने प्रश्न पूछेलो के, ‘तमे बहिरात्माने आत्मस्वरूपनो बोध केम करता नथी? तेना प्रत्युत्तरमां एम कह्युं केः

अंतर्ज्ञान न जेहने, मूढ बाह्यमां तुष्ट;
कौतुक जस नहि बाह्यमां, बुध अंतःसंतुष्ट. ६०.