११०समाधितंत्र
(१) बहिरात्माओ वस्तुस्वरूपथी तद्दन अज्ञात छे. तेओ एटला मूढ छे के तेमने बोध करो के न करो, तेमने माटे बधुं सरखुं छे. (जुओः श्लोक ५८)
(२) आत्मस्वरूप स्वसंवेदनगम्य छे. ते शब्दो द्वारा बीजाने समजावी शकाय नहि अने ते समजे पण नहि, एटले तेमने बोध करवो व्यर्थ छे. (जुओः श्लोक ५९)
(३) आ श्लोक ६०मां कह्युं छेः —
अनादि मिथ्यात्वने लीधे बहिरात्माने स्व – परनुं भेद – विज्ञान नथी, तेने आत्मस्वरूपनुं भान नथी; तेथी ते शरीरादि बाह्य पदार्थोमां ज आनंद माने छे, तेमां ज अनुराग करे छे, पण आत्मस्वरूपनो महिमा लावी तेमां प्रीति करतो नथी. तेनुं कारण – अविद्याना गाढ संस्कारथी तेनुं ज्ञान मूर्च्छाई गयुं छे, आच्छादित थई गयुं छे; ते छे.
अन्तरात्माने विवेक – ज्योति प्रगट थई छे, तेथी तेने शरीरादि बाह्य पदार्थोमां प्रीति नथी. तेमां तेने क्यांय सुख भासतुं नथी. ते तरफ ते बहु उदासीन रहे छे. ते त्यांथी हठी स्वसन्मुख थई आत्मस्वरूपमां स्थित थवा माटे सदा प्रयत्नशील छे. ज्यां एने आवी ज्ञानदशा वर्तती होय, त्यां बीजाओने बोध देवानुं तेने केम गमे? न ज गमे. ६०.
कया कारणे ते (अन्तरात्मा) शरीरादि विषयमां भूषण – मंडनादिमां अनुरागरहित (उदासीन) होय छे? ते कहे छेः —
अन्वयार्थ : — अन्तरात्मा विचारे छे के — (शरीराणि) शरीरो (सुख – दुःखानि न जानन्ति) सुख तथा दुःखने जाणतां नथी. (तथापि) तेम छतां (अबुद्ध्यः) मूढ जीवो (अत्र एव) एमां ज एटले ए शरीरोमां ज (निग्रहानुग्रहधियं) निग्रह अने अनुग्रहनी बुद्धि (कुर्वते) करे छे.