Samadhitantra-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समाधितंत्र१११

टीकासुखदुःखानि न जानन्ति कानि ? शरीराणि जडत्वात् अबुद्ध्यो बहिरात्मनः तथापि यद्यपि न जानन्ति तथापि अत्रैव शरीरादावेव कुर्वते कां ? निग्रहानुग्रहधियं द्वेषवशादुपवासादिना शरीरादेः कदर्थनाभिप्रायो निग्रहबुद्धिं रागवशात्कटकटिसूत्रादिना भूषणाभिप्रायोऽनुग्रहबुद्धिम् ।।६१।।

टीका :सुख दुःख जाणतां नथी. कोण (जाणतां नथी)? शरीरो जडपणाने लीधे (जाणतां नथी); बुद्धि विनाना बहिरात्माओ, तेम छतां अर्थात् (शरीरो) जाणतां नथी तेम छतां, एमां ज एटले शरीरादिमां ज करे छे. शुं (करे छे)? निग्रहअनुग्रहनी बुद्धि (करे छे)अर्थात् द्वेषने आधीन थई उपवासादि द्वारा शरीरादिने कृश करवानो अभिप्राय ते निग्रहबुद्धि अने रागने आधीन थई कंकण, कटिसूत्रादि वडे (शरीरादिने) भूषित करवानो (शणगारवानो) अभिप्राय ते अनुग्रहबुद्धि (करे छे).

भावार्थ :शरीरो अचेतनजड छे. तेमने सुखदुःख नथी, तेम ज तेमने ज्ञान नथी; तेम छतां बुद्धि विनाना बहिरात्माओ द्वेषवश उपवासादि द्वारा तेमने (शरीरोने) निग्रह करवानी अर्थात् कृश करवानी बुद्धि करे छे अने रागवश तेमने कंकण, कटिसूत्र (कंदोरो) आदि वडे विभूषित करी अनुग्रह (कृपा) करवानी बुद्धि करे छे.

बहिरात्माने देहाध्यास छे एटले देहमां तेने आत्मबुद्धि छे; तेथी तेने शरीरादि विषे निग्रहअनुग्रह बुद्धि रहे छे, परंतु अन्तरात्माने भेदज्ञान वर्ते छे. ते आत्माने शरीरादिथी अत्यंत भिन्न माने छे. तेने तेनी साथे एकताबुद्धि नथी, तेथी तेने शरीरादि विषे रागद्वेष के अनुग्रहनिग्रहबुद्धिनो श्रद्धामां अभाव होय छे. अस्थिरताने लीधे शरीरादि शणगारवानो राग आवे, पण अभिप्रायमां तेनो स्वीकार नथी, तेने ते दोष माने छे, एटले ते शरीरादि पर पदार्थो प्रत्ये उदासीन होय छे.

विशेष

अज्ञानीओ माने छे के शरीराश्रित उपवास, व्रत, नियमादिथी शरीरने कृश करतां इन्द्रियोनो निग्रह थाय छे, विषयोमां तेमनी प्रवृत्ति अटकी जाय छे अने तेथी रागद्वेषादि थतां नथी; पण आ मान्यता भूल भरेली छे, कारण के शरीराश्रित उपवास करवा, पंचाग्नि तप करवुं, मौन राखवुं, ताटक करवुं, अनेक योगआसनो करवां वगेरे पौद्गलिक जड १. जुओः ‘शरीराश्रित उपवासादि माटे ‘मोक्षमार्ग प्रकाशक’ गु. आवृत्ति पृ. २३५ अने २४५.

(‘‘.....जो देहाश्रित व्रतसंयमने पण पोतानां माने (अर्थात् पोताने तेनो कर्ता माने) तो ते मिथ्याद्रष्टि
छे......’’) पृ. ३४४.