११२समाधितंत्र
टीका — स्वबुद्ध्या आत्मबुद्ध्या यावद् गृहणीयात् । किं ? त्रयम् । केषाम् ? कायवाक्चेतसां सम्बन्धमिति पाठः । तत्र कायवाक्चेतसां त्रयं कर्तृ । आत्मनि यावत्सम्बन्धं गृह्णीयत्स्वीकुर्यादित्यर्थः । तावत्संसारः । एतेषां कायवाक्चेतसां भेदाभ्यासे तु आत्मनः सकाशात् क्रियाओ छे. तेनो संबंध शरीर साथे छे, आत्मा साथे नथी. शरीर जड छे. तेने सुख – दुःख होतुं नथी. अज्ञानीने शरीर साथे एकताबुद्धि छे, तेथी ते शरीरनी जे अवस्थाओ थाय छे ते पोतानी (आत्मानी) थई माने छे, ए तेनो भ्रम छे.
वळी अज्ञानी मोहवशात् वस्त्र – आभूषणादि द्वारा शरीर उपर अनुग्रह (उपकार) करवानी बुद्धि करे छे, कारण के तेने देहाध्यास छे – शरीरमां तेने आत्मबुद्धि छे, एटले तेना प्रत्ये रागना कारणे तेवो अनुग्रह करवा इच्छे छे, परंतु आ पण तेनो भ्रम छे.
माटे शरीर विषे निग्रह – अनुग्रहबुद्धि करवी ते अज्ञानता छे. ६१.
ज्यां सुधी शरीरादिमां आत्मबुद्धिथी प्रवृत्ति छे, त्यां सुधी संसार छे. तेना अभावे मुक्ति छे. ते दर्शावतां कहे छेः —
अन्वयार्थ : — (यावत्) ज्यां सुधी (कायवाक्चेतसां त्रयं) शरीर, वचन अने मन – ए त्रणने जीव (स्वबुद्ध्या) आत्मबुद्धिथी (गृह्णीयात्) ग्रहण करे, (तावत्) त्यां सुधी (संसारः) संसार छे, (तु) परंतु (एतेषां) ए मन – वचन – कायनो (भेदाभ्यासे) आत्माथी भिन्नरूप अभ्यास थतां (निर्वृत्तिः) मुक्ति थाय छे.
टीका : — स्वबुद्धिथी एटले आत्मबुद्धिथी ज्यां सुधी ग्रहण करे, शुं (ग्रहण करे)? त्रयने (त्रणने). कोना (त्रयने)? काय, वाणी अने मनना त्रयने – अर्थात् ज्यां सुधी आत्मा विषे काय – वाणी – मननो संबंध ग्रहण करे – स्वीकार करे, एवो अर्थ छे – त्यां सुधी संसार छे,