Samadhitantra-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 62.

< Previous Page   Next Page >


Page 99 of 170
PDF/HTML Page 128 of 199

 

११२समाधितंत्र

यावच्च शरीरादावात्मबुद्ध्या प्रवृत्तिस्तावत्संसारः तदभावान्मुक्तिरिति दर्शयन्नाह
स्वबुद्ध्या यावद्गृह्णीयात् कायवाक्चेतसां त्रयम्
संसारस्तावदेतेषां भेदाभ्यासे तु निर्वृत्तिः ।।६२।।

टीकास्वबुद्ध्या आत्मबुद्ध्या यावद् गृहणीयात् किं ? त्रयम् केषाम् ? कायवाक्चेतसां सम्बन्धमिति पाठः तत्र कायवाक्चेतसां त्रयं कर्तृ आत्मनि यावत्सम्बन्धं गृह्णीयत्स्वीकुर्यादित्यर्थः तावत्संसारः एतेषां कायवाक्चेतसां भेदाभ्यासे तु आत्मनः सकाशात् क्रियाओ छे. तेनो संबंध शरीर साथे छे, आत्मा साथे नथी. शरीर जड छे. तेने सुख दुःख होतुं नथी. अज्ञानीने शरीर साथे एकताबुद्धि छे, तेथी ते शरीरनी जे अवस्थाओ थाय छे ते पोतानी (आत्मानी) थई माने छे, ए तेनो भ्रम छे.

वळी अज्ञानी मोहवशात् वस्त्रआभूषणादि द्वारा शरीर उपर अनुग्रह (उपकार) करवानी बुद्धि करे छे, कारण के तेने देहाध्यास छेशरीरमां तेने आत्मबुद्धि छे, एटले तेना प्रत्ये रागना कारणे तेवो अनुग्रह करवा इच्छे छे, परंतु आ पण तेनो भ्रम छे.

माटे शरीर विषे निग्रहअनुग्रहबुद्धि करवी ते अज्ञानता छे. ६१.

ज्यां सुधी शरीरादिमां आत्मबुद्धिथी प्रवृत्ति छे, त्यां सुधी संसार छे. तेना अभावे मुक्ति छे. ते दर्शावतां कहे छेः

श्लोक ६२

अन्वयार्थ :(यावत्) ज्यां सुधी (कायवाक्चेतसां त्रयं) शरीर, वचन अने मन ए त्रणने जीव (स्वबुद्ध्या) आत्मबुद्धिथी (गृह्णीयात्) ग्रहण करे, (तावत्) त्यां सुधी (संसारः) संसार छे, (तु) परंतु (एतेषां) ए मनवचनकायनो (भेदाभ्यासे) आत्माथी भिन्नरूप अभ्यास थतां (निर्वृत्तिः) मुक्ति थाय छे.

टीका :स्वबुद्धिथी एटले आत्मबुद्धिथी ज्यां सुधी ग्रहण करे, शुं (ग्रहण करे)? त्रयने (त्रणने). कोना (त्रयने)? काय, वाणी अने मनना त्रयनेअर्थात् ज्यां सुधी आत्मा विषे कायवाणीमननो संबंध ग्रहण करेस्वीकार करे, एवो अर्थ छेत्यां सुधी संसार छे,

ज्यां लगी मन-वच-कायने आतमरूप मनाय,
त्यां लगी छे संसार ने भेद थकी शिव थाय. ६२.