कायवाक्चेतांसि भिन्नानीति भेदाभ्यासे भेदभावनायां तु पुनर्निर्वृत्तिः मुक्तिः ।।६२।। पण ए काय – वाणी – मनना भेदनो अभ्यास थतां अर्थात् आत्माथी काय – वाणी – मन भिन्न छे. एवो भेदनो अभ्यास थतां एटले भेदभावना थतां निर्वृत्ति एटले मुक्ति थाय छे.
भावार्थ : — ज्यां सुधी जीवने मन – वचन – कायमां आत्मबुद्धि रहे छे, तेने आत्माना अंग समजे छे एटले के तेनी साथे अभेदबुद्धि – एकताबुद्धि करे छे, त्यां सुधी ते संसारमां परिभ्रमण करतो रहे छे, परंतु ज्यारे तेने मन – वचन – कायमां आत्मबुद्धिनो भ्रम टळी जाय छे, अर्थात् ते त्रणे ‘आत्माथी भिन्न छे’ एवो निश्चयपूर्वक अनुभवनो अभ्यास थाय छे, त्यारे ते संसारना बंधनथी मुक्ति पामे छे.
ज्यां शरीरादि पर पदार्थोमां आत्मबुद्धि छे त्यां एकताबुद्धि छे. ज्यां एकताबुद्धि होय छे, त्यां कर्ता – भोक्ताबुद्धि अवश्य होय छे अने ज्यां कर्ता – बुद्धि छे, त्यां संसारना कारणभूत रागादि भाव अनिवार्यपणे होय छे. ए रीते शरीरादि पर पदार्थोमां आत्म – बुद्धि ते ज संसारनुं कारण छे अने आत्मा तथा शरीरादिनो भेद – विज्ञानपूर्वक द्रढ अभ्यास ते मुक्तिनुं कारण छे.
मन – वचन – कायनी प्रवृत्ति ए संसारनुं कारण नथी, कारण के ते जडनी क्रिया छे, परंतु तेमां आत्मबुद्धि – एकताबुद्धि करवी ते संसारनुं कारण छे. प्रस्तुत श्लोकमां ‘स्वबुद्ध्या’ शब्दथी आ वात सूचित थाय छे.
‘‘कर्मबंध करनारुं कारण नथी, बहु कर्मयोग्य पुद्गलोथी भरेलो लोक, नथी चलन स्वरूप कर्म (अर्थात् काय – वचन – मननी क्रियारूप योग), नथी अनेक प्रकारनां कारणो के नथी चेतन – अचेतननो घात. ‘उपयोगभू’ अर्थात् आत्मा रागादिक साथे जे ऐक्य पामे छे ते ज एक ( – मात्र रागादिक साथे एकपणुं पामवुं ते ज) खरेखर पुरुषोने बंधनुं कारण छे.’’१
माटे शरीरादिनी क्रियामां आत्मबुद्धि अर्थात् ते क्रियाओ हुं करुं छुं एवी मान्यता ते संसारनुं कारण छे अने ते क्रियाओमां आत्मबुद्धि अर्थात् कर्ताबुद्धिनो अभाव ते मोक्षनुं कारण छे. ६२. १. जुओ – श्री समयसार कलश १६४ अने गा. २३७ थी २४१.