Samadhitantra-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समाधितंत्र११३

कायवाक्चेतांसि भिन्नानीति भेदाभ्यासे भेदभावनायां तु पुनर्निर्वृत्तिः मुक्तिः ।।६२।। पण ए कायवाणीमनना भेदनो अभ्यास थतां अर्थात् आत्माथी कायवाणीमन भिन्न छे. एवो भेदनो अभ्यास थतां एटले भेदभावना थतां निर्वृत्ति एटले मुक्ति थाय छे.

भावार्थ :ज्यां सुधी जीवने मनवचनकायमां आत्मबुद्धि रहे छे, तेने आत्माना अंग समजे छे एटले के तेनी साथे अभेदबुद्धिएकताबुद्धि करे छे, त्यां सुधी ते संसारमां परिभ्रमण करतो रहे छे, परंतु ज्यारे तेने मनवचनकायमां आत्मबुद्धिनो भ्रम टळी जाय छे, अर्थात् ते त्रणे ‘आत्माथी भिन्न छे’ एवो निश्चयपूर्वक अनुभवनो अभ्यास थाय छे, त्यारे ते संसारना बंधनथी मुक्ति पामे छे.

विशेष

ज्यां शरीरादि पर पदार्थोमां आत्मबुद्धि छे त्यां एकताबुद्धि छे. ज्यां एकताबुद्धि होय छे, त्यां कर्ताभोक्ताबुद्धि अवश्य होय छे अने ज्यां कर्ताबुद्धि छे, त्यां संसारना कारणभूत रागादि भाव अनिवार्यपणे होय छे. ए रीते शरीरादि पर पदार्थोमां आत्म बुद्धि ते ज संसारनुं कारण छे अने आत्मा तथा शरीरादिनो भेदविज्ञानपूर्वक द्रढ अभ्यास ते मुक्तिनुं कारण छे.

मनवचनकायनी प्रवृत्ति ए संसारनुं कारण नथी, कारण के ते जडनी क्रिया छे, परंतु तेमां आत्मबुद्धिएकताबुद्धि करवी ते संसारनुं कारण छे. प्रस्तुत श्लोकमां ‘स्वबुद्ध्या’ शब्दथी आ वात सूचित थाय छे.

‘‘कर्मबंध करनारुं कारण नथी, बहु कर्मयोग्य पुद्गलोथी भरेलो लोक, नथी चलन स्वरूप कर्म (अर्थात् कायवचनमननी क्रियारूप योग), नथी अनेक प्रकारनां कारणो के नथी चेतनअचेतननो घात. ‘उपयोगभू’ अर्थात् आत्मा रागादिक साथे जे ऐक्य पामे छे ते ज एक (मात्र रागादिक साथे एकपणुं पामवुं ते ज) खरेखर पुरुषोने बंधनुं कारण छे.’’

माटे शरीरादिनी क्रियामां आत्मबुद्धि अर्थात् ते क्रियाओ हुं करुं छुं एवी मान्यता ते संसारनुं कारण छे अने ते क्रियाओमां आत्मबुद्धि अर्थात् कर्ताबुद्धिनो अभाव ते मोक्षनुं कारण छे. ६२. १. जुओश्री समयसार कलश १६४ अने गा. २३७ थी २४१.