Samadhitantra-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 63.

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११४समाधितंत्र

शरीरदावात्मनो भेदाभ्यासे च शरीरदृढतादौ नात्मनो दृढतादिकं मन्यते इति दर्शयन् धनेत्यादि श्लोकचतुष्टयमाह

घने वस्त्रे यथाऽऽत्मानं न घनं मन्यते तथा
घने स्वदेहेप्यात्मानं न घनं मन्यते बुधः ।।६३।।

‘‘शरीरादिमां आत्मानो भेदाभ्यास थतां, ते (अन्तरात्मा) शरीरनी द्रढतादि थतां आत्मानी द्रढतादिक मानतो नथी,’’ एम बतावी ‘घन’ इत्यादि चार श्लोक कहे छेः

श्लोक ६३

अन्वयार्थ :(यथा) जेवी रीते (घने वस्त्रे) जाडुं वस्त्र पहेरवाथी (बुधः) बुद्धिमान पुरुष (आत्मानं) पोताने एटले पोताना शरीरने (घनं) जाडोपुष्ट (न मन्यते) मानतो नथी, (तथा) तेवी रीते (स्वदेहे अपि घने) पोतानुं शरीर जाडुंपुष्ट थवा छतां, (बुधः) अन्तरात्मा (आत्मानं) आत्माने (घनं न मन्यते) जाडोपुष्ट मानतो नथी.

टीका :घन एटले गाढुं (जाडुं) वस्त्र पहेरवाथी, जेम बुध (डाह्यो पुरुष) पोताने (शरीरने) जाडोपुष्ट मानतो नथी, तेम पोतानुं शरीर जाडुंपुष्ट थवा छतां बुध (अन्तरात्मा) आत्माने जाडोपुष्ट मानतो नथी.

भावार्थ :जेम जाडुं वस्त्र पहेरवाथी, डाह्यो माणस, पोताने जाडो थयेलो मानतो नथी, तेम शरीर जाडुं थतां, आत्मा जाडो थयो, एम अन्तरात्मा कदी मानतो नथी.

जेम शरीर अने वस्त्र भिन्न भिन्न छे, तेम शरीर अने आत्मा पण एकबीजाथी भिन्न छे. आम छतां देहमां आत्मबुद्धिने लीधे अज्ञानी जीव शरीरनी पुष्टिथी आत्मानी पुष्टि माने छे; आ भ्रान्तिथी ते सारा खोराकादिथी शरीरने पुष्ट करवानी बुद्धि करे छे; परंतु ज्ञानी ते बाबतमां उदासीन रहे छे, कारण के ते शरीरनी पुष्टिथी आत्मानी पुष्टि कदी मानतो नथी. तेने शरीर अने आत्माबंनेनुं भेदज्ञान वर्ते छे; तेथी ते सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रथी ज पोताना आत्मानी पुष्टि माने छे. ६३.

स्थूल वस्त्रथी जे रीते स्थूल गणे न शरीर,
पुष्ट देहथी ज्ञानीजन पुष्ट न माने जीव. ६३.