टीका — यदुत्प्रेक्षाजालं चिंताजालं कथम्भूतं ? अन्तर्जल्पसंपृक्तं अन्तर्वचनव्यापारोपेतं । आत्मनो दुःखस्य मूलं कारणं । तन्नाशे तस्योत्प्रेक्षाजालस्य विनाशे । इष्टमभिलषितं यत्पदं तच्छिष्टं प्रतिपादितम् ।।८५।।
अन्वयार्थ : — (अन्तर्जल्पसंपृक्तं) अंतरंग जल्पयुक्त (यत् उत्प्रेक्षाजालं) जे विकल्पजाल छे ते (आत्मनः) आत्माना (दुःखस्य) दुःखनुं (मूलं) मूल – कारण छे. (तन्नाशे) तेनो एटले विकल्पजालनो नाश थतां (इष्ट) हितकारी (परमं पदं शिष्टम्) परम पदनी प्राप्ति थाय छे – एम प्रतिपादन कर्युं छे.
टीका : — जे उत्प्रेक्षाजाल एटले विकल्पजाल छे, ते केवी छे? अन्तर्जल्पथी युक्त अर्थात् अंतरंग वचन – व्यापारथी युक्त छे, ते आत्माना दुःखनुं मूल एटले कारण छे. तेनो नाश थतां अर्थात् ते उत्प्रेक्षाजालनो (विकल्पजालनो) नाश थतां, ए पद इष्ट एटले अभिलषित छे (जे पदनी अभिलाषा करवामां आवी छे) ते शिष्ट छे अर्थात् तेनुं प्रतिपादन करवामां आव्युं छे.
भावार्थ : — अंतरंग जल्प (सूक्ष्म – वचन – प्रवृत्ति) युक्त जे अनेक प्रकारना विकल्परूप कल्पनाजाल छे ते संसारी आत्माने दुःखनुं मूल छे. तेनो नाश थाय तो ज परम वीतराग पदनी प्राप्ति थाय.
आ जीव पोताना चिदानन्दमय परम अतीन्द्रिय अविनाशी निर्विकल्प स्वरूपने भूली, ज्यां सुधी बाह्य विषयोना लक्षे दुःखोना मूल कारणभूत अन्तर्जल्परूप अनेक विकल्पोनी जाळमां फसायेलो रहे छे, त्यां सुधी तेने सुखमय परम वीतराग पदनी प्राप्ति थती नथी. ते पदनी प्राप्ति तो तेने होय जे अन्तर्जल्परूप विकल्पोनी जालनो सर्वथा त्याग करी पोताना चैतन्य चमत्काररूप विज्ञानघन आत्मामां लीन थई जाय.
हिंसादि अव्रतरूप अशुभ विकल्पो अने अहिंसादि व्रतरूप शुभ विकल्पो – बंने प्रकारना विकल्पो राग – द्वेषादिरूप होवाथी आत्मस्वरूपना घातक छे. भगवाननी पूजा – भक्ति, अणुव्रत महाव्रतादि तथा तपादि करवाना भाव पण शुभ विकल्प छे. आ समस्त शुभ – अशुभ विकल्पोथी हठी उपयोग ज्यारे आत्मस्वरूपमां स्थिर थाय छे त्यारे ज परम वीतराग पदनी प्राप्ति थाय छे.