Samadhitantra-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 86.

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१४६समाधितंत्र

तस्य चोत्प्रेक्षाजालस्य नाशं कुर्वाणोऽनेन क्रमेण कुर्यादित्याह
अव्रती व्रतमादाब व्रती ज्ञानपरायणः
परात्मज्ञानसम्पन्नः स्वयमेव परो भवेत् ।।८६।।

‘‘आत्माने आत्मा वडे बे पुण्यपापरूप शुभाशुभ योगोथी रोकीने दर्शनज्ञानमां स्थित थई अने अन्य वस्तुनी इच्छाथी विरमी (अटकी) जे आत्मा (इच्छारहित थवाथी) सर्व संगथी रहित थई पोताना आत्माने आत्मा वडे ध्यावे छेकर्म अने नोकर्मने ध्यातो नथी, पोते चेतयिता (देखनारजाणनार) होवाथी एकत्वने ज चिंतवे छेचेते छेअनुभवे छे, ते आत्मा आत्माने ध्यातो, दर्शनज्ञानमय अने अनन्यमय थई अल्पकाळमां ज कर्मथी रहित आत्माने पामे छे.’’

‘‘.....वस्तुस्वरूपने जेम छे तेम जाणीने ज्यां ज्ञान तेमां एकाग्र थाय त्यां राग के विकल्पनी उत्पत्ति ज थती नथी; एनुं नाम ज चित्तनो निरोध. आ सिवाय ‘हुं चित्तने रोकुं, हुं विकल्पने रोकुं’ एवी नास्तिना लक्षे कांई विकल्प तूटतो नथी, पण विकल्प उत्पन्न थाय छे. ‘हुं चैतन्यमात्र स्वभाव छुं’ एम अस्तित्वभाव तरफ ज्ञाननुं जोर आपतां चित्तनो निरोध सहेजे थई जाय छे, स्वभावनी एकाग्रताना जोरे रागनाविकल्पनो अभाव थई जाय छे; माटे पहेलां वस्तुना स्वभावने बधां पडखाथी जेम छे तेम जाणवो जोईए.

ज्यां श्रुतज्ञानने सन्मुख वाळीने अंदर स्वभावमां एकाग्र कर्युं त्यां सर्व विकल्पो स्वयं विलय थाय छे अने अनंत धर्मोनो चैतन्यपिंडलो स्वसंवेदनमां आवी जाय छे.’’ ८५.

ते उत्प्रेक्षाजालनो नाश करनारे आ क्रमथी करवुंते कहे छेः

श्लोक ८६

अन्वयार्थ :(अव्रती) हिंसादिक पांच अव्रतोमां अनुरक्त माणसे (व्रतं आदाय)अहिंसादि व्रतोनुं ग्रहण करीने अव्रतावस्थामां थतां विकल्पोनो नाश करवो तथा (व्रती) अहिंसादिक व्रतोना धारके (ज्ञानपरायणः) ज्ञानस्वभावमां लीन थई व्रतावस्थामां थता विकल्पोनो नाश करवो अने पछी अरहंतअवस्थामां (परात्मज्ञानसम्पन्नः) केवळज्ञानथी युक्त १. श्री समयसारगु. आवृत्तिगाथा १८७, १८८, १८९. २. नयप्रज्ञापनपृ. ८, २३.

अव्रति-जन व्रतने ग्रहे, व्रती ज्ञानरत थाय;
परम-ज्ञानने पामीने स्वयं ‘परम’ थई जाय. ८६