टीका — अव्रतित्वावस्थाभावि विकल्पजालं व्रतमादाय विनाशयेत् । व्रतित्वावस्थाभावि पुनर्विकल्पजालं ज्ञानपरायणो ज्ञानभावनानिष्ठो भूत्वा परमवीतरागतावस्थायां विनाशयेत् । संयोगिजिनावस्थायां परात्मज्ञानसम्पन्नः परं सकलज्ञानेभ्यः उत्कृष्टं तच्चा तदात्मज्ञानं च केवलज्ञानं तेन सम्पन्नो युक्तः स्वयमेव गुर्वाद्युपदेशानपेक्षः परः सिद्धस्वरूपः परमात्मा भवेत् ।।८६।। थई (स्वयम् एव) स्वयं ज (परः भवेत्) परमात्मा थवुं – सिद्धस्वरूपने प्राप्त करवुं.
टीका : — अव्रतीपणानी अवस्थामां थतां विकल्पोनी जालनो, व्रत ग्रहण करीने, विनाश करवो, तथा व्रतीपणानी अवस्थामां थतां विकल्पोनी जालनो, ज्ञानपरायण थईने, अर्थात् ज्ञानभावनामां लीन थईने परम वीतरागतानी अवस्थामां (तेनो) विनाश करवो. सयोगीजिन अवस्थामां परात्मज्ञानसंपन्न अर्थात् पर एटले सर्व ज्ञानोमां उत्कृष्ट जे आत्मज्ञान – जे केवळज्ञान – तेनाथी संपन्न एटले युक्त थईने स्वयं ज अर्थात् गुरु आदिना उपदेशनी अपेक्षा राख्या विना (निरपेक्ष थईने) पर एटले सिद्धस्वरूप परमात्मा थवुं.
भावार्थ : — विकल्प – जालनो नाश करी सिद्धस्वरूपनी प्राप्ति केवी रीते करवी तेनो नीचे प्रमाणे आचार्ये क्रम बताव्यो छेः —
१. अव्रत अवस्थामां हिंसादि पापोना जे विकल्पो थाय तेनो अहिंसादि व्रतोनुं ग्रहण करी नाश करवो.
२. व्रत अवस्थामां अहिंसादि शुभभावरूप जे विकल्पो थाय तेनो ज्ञानपरायण थई अर्थात् ज्ञानभावनामां लीन थई विनाश करवो.
३. ज्ञानभावनामां लीन थतां परम वीतराग तथा केवळज्ञानयुक्त जिन दशा (अरहंतअवस्था) प्रगटे छे;
४. अने स्वयं ज सिद्धपदनी प्राप्ति थाय छे.
‘‘व्रत – अव्रत ए बंने विकल्परहित ज्यां परद्रव्यना ग्रहण – त्यागनुं कांई प्रयोजन नथी एवो उदासीन वीतराग शुद्धोपयोग छे, ते ज मोक्षमार्ग छे.......
......पहेलां अशुभोपयोग छूटी शुभोपयोग थाय, पछी शुभोपयोग छूटी शुद्धोपयोग थाय, एवी क्रमपरिपाटी छे.’’१ १. मोक्षमार्ग प्रकाशक – गु. आवृत्ति पृ. २६२