Samadhitantra-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१४८समाधितंत्र

धर्मनी शरूआत चोथा अविरत सम्यक्त्व गुणस्थानथी थाय छे. ते पहेलां जीवनी मिथ्यात्व अवस्था होय छे. आ अवस्थामां जे व्रततपादि करवानो विकल्प आवे छे ते बधां बाल तप गणाय छे.

अविरत सम्यग्द्रष्टिओने, देशविरत श्रावकोने अने मुनिओने भूमिकानुसार शुभ अशुभ विकल्पो आवे छे, परंतु तेमने भेदविज्ञान होवाथी ते विकल्पोने तेओ श्रद्धा-ज्ञानमां पोतानुं स्वरूप मानता नथी, शुद्ध आत्मस्वरूपनी प्राप्तिमां तेमने विघ्नरूप माने छे अने ते छोडवा माटे पोतानी भूमिकानुसार प्रयत्न करे छे.

‘जेने (सम्यग्द्रष्टि श्रावकने) जेटले अंशे सम्यग्दर्शन होय छे (शुद्धि छेशुद्धभाव छे, रागरहित अंश छे) तेटले अंशे तेने बंध नथी; जेटले अंशे राग छे तेटले अंशे तेने बंध थाय छे.

तेने जेटले अंशे सम्यग्ज्ञान छे तेटले अंशे बंध नथी अने जेटले अंशे राग छे तेटले अंशे तेने बंध थाय छे;

तेने जेटले अंशे सम्यक्चारित्र छे तेटले अंशे तेने बंध नथी अने जेटले अंशे राग छे तेटले अंशे तेने बंध थाय छे.’’

आथी स्पष्ट छे के सम्यग्द्रष्टिने भूमिकानुसार जे पूजा, भक्ति, आदि तथा व्रत, महाव्रत, नियमादिनो शुभभाव आवे छे ते पण आस्रवबंधनुं कारण छे, पण ते संवर निर्जरानुं कारण नथी. संवरनिर्जरानुं कारण तो शुभ अंशो साथे जे शुद्ध अंश छे ते ज छे. जे शुभ राग बंधनुं कारण होय ते मोक्षनुं कारण कदी होई शके नहि. माटे व्रतादिना शुभ विकल्पोने पण अव्रतादि अशुभ विकल्पोनी जेम मोक्षमार्गमां हेयछोडवा योग्य गणवामां आव्या छे. १. जुओश्री समयसार गाथा१५२, १५३. २.येनांशेन सुदृष्टिस्तेनांशेनास्य बन्धनं नास्ति

येनांशेन तु रागस्तेनांशेनास्य बन्धनं भवति ।।२१२।।

येनांशेन ज्ञान तेनांशेनास्य बन्धनं नास्ति

येनांशेन तु रागस्तेनांशेनास्य बन्धनं भवति ।।२१३।।

येनांशेन चारित्रं तेनांशेनास्य बन्धनं नास्ति

येनांशेन तु रागस्तेनांशेनास्य बन्धनं भवति ।।२१४।। (पुरुषार्थसिद्ध्युपाय-गा. २१२ थी २१४)