Samadhitantra-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 87.

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समाधितंत्र१४९
यथा च व्रतविकल्पो मुक्तिहेतुर्न भवति तथा लिङ्गविकल्पोऽपीत्याह
लिङ्गं देहाश्रितं दृष्टं देह एवात्मनो भवः
न मुच्यते भवात्तस्मात्ते ये लिङ्गकृताग्रहाः ।।८७।।

टीकालिङ्गं जटाधारणनग्नत्वादिदेहाश्रितं दृष्टं शरीरधर्मतया प्रतिपन्नं देह एवात्मनो भवः संसारः यत एवं तस्माद्ये लिंगकृताग्रहाः लिंगमेव मुक्तेर्हेतुरितिकृताभिनिवेशास्ते न मुच्यंते कस्मात् भवात् ।।८७।।

‘‘ज्यां सुधी यथाख्यात चारित्र थतुं नथी, त्यां सुधी सम्यग्द्रष्टिने बे धारा रहे छे शुभाशुभ कर्मधारा अने ज्ञानधारा. ते बंने साथे रहेवामां कोई विरोध नथी. ते स्थितिमां कर्म (अशुद्धभावरूप कर्म) पोतानुं कार्य करे छे अने ज्ञान (शुद्धभावरूप ज्ञानकर्म) पोतानुं कार्य करे छे. जेटला अंशे शुभाशुभ कर्मधारा छे तेटला अंशे कर्मबंध थाय छे अने जेटला अंशे ज्ञानधारा छे तेटला अंशे कर्मनो नाश थतो जाय छे. विषयकषायना विकल्पो के व्रत नियमना विकल्पोशुद्धस्वरूपनो विचार सुद्धांकर्मबंधनुं कारण छे; शुद्ध परिणतिरूप ज्ञानधारा ज मोक्षनुं कारण छे.’’

सातमा अप्रमत्त गुणस्थानथी जे निर्विकल्प दशा थाय छे ते दशामां आत्मस्वरूपमां स्थिरता जामती जाय छे अने अंते शुक्लध्यान द्वारा केवलज्ञान प्राप्त करी सिद्धपदनी प्राप्ति थाय छे. ८६.

जेम व्रतनो विकल्प मुक्तिनो हेतु नथी, तेम लिंगनो विकल्प पण मुक्तिनो हेतु नथी, ते कहे छेः

श्लोक ८७

अन्वयार्थ :(लिङ्गं) नग्नपणुं आदि (देहाश्रित दृष्टं) देहने आश्रित जोवामां आवे छे. (देहः एव) देह ज (आत्मनः भवः) आत्मानो भव (संसार) छे; (तस्मात्) तेथी (ये लिङ्गकृताग्रहाः) जे लिंगना ज आग्रही छे (ते पुरुषाः) ते पुरुषो (भवात्) संसारथी (न मुच्यन्ते) मुक्त थता नथी. १. श्री समयसार गु. आवृत्तिकलश ११०नो भावार्थ.

तनने आश्रित लिंग छे, तन जीवनो संसार;
तेथी लिंगाग्रही तणो छूटे नहि संसार. ८७.