Samadhitantra-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१५०समाधितंत्र

येऽपि ‘वर्णानां ब्राह्मणो गुरुरतः स एव परमपदयोग्य’ इति वदन्ति तेऽपि न मुक्तियोग्या इत्याह

टीका :लिंग एटले जटाधारण, नग्नपणुं, आदिते देहाश्रित देखाय छेअर्थात् शरीरना धर्मरूपे मानवामां आवे छे. देह ज आत्मानो भव एटले संसार छे; तेथी जे लिंगने विषे आग्रह राखे छेअर्थात् लिंग ए ज मुक्तिनो हेतु छे एवा अभिनिवेशवाळा जे छे ते (लोक) मुक्त थता नथी. शानाथी? भवथी (संसारथी).

भावार्थ :जे जीव केवळ लिंग अथवा बाह्य वेषने ज मोक्षनुं कारण माने छे ते देहात्मद्रष्टि छे अर्थात् ते देहने ज आत्मा माने छे, तेथी ते मुक्ति पामतो नथी. लिंग शरीरने आश्रित छे अने शरीर साथेना संबंधथी ज आत्मानो संसार छे. शरीरना अभावमां संसार होतो नथी. माटे जे लिंगनो आग्रही छे अर्थात् जे लिंगने ज मुक्तिनुं कारण समजे छे ते संसारनो ज आग्रही छे; ते कदी संसारथी छूटी शकतो नथी.

विशेष

अंतरंग वीतरागस्वरूप आत्माना धर्म विना लिंगमात्रथीबाह्य वेषमात्रथी धर्मनी सम्पत्तिरूप सम्यक्त्वनी प्राप्ति थती नथी; माटे रागद्वेषरहित आत्मानो शुद्धज्ञानदर्शनरूप स्वभाव जे अंतरंग भावधर्म छे तेने, हे भव्य! तुं जाण. बाह्य लिंगवेषमात्रथी तने शुं प्रयोजन छे? कांई पण नहि.

शरीरनी नग्न अवस्था, अठ्ठावीस मूल गुणोनुं पालनादि बाह्यलिंग ए मुनि अवस्थामां नियमा होय छे; तेथी विरुद्ध दशा होय तो ते भावलिंगी मुनि होय नहि, परंतु ते बाह्य लिंगथी अथवा अठ्ठावीस मूल गुणोना पालनथी मोक्ष थाय एवी जे श्रद्धा करे ते मिथ्याद्रष्टि छे. लिंग संबंधीनो विकल्प पण आत्मसाधनामां बाधक छे. मुनिने बाह्य लिंग हरकोई होय तो चाले एम अहीं कहेवानो हेतु नथी. श्री कुन्दकुन्दाचार्ये जे त्रण प्रकारना लिंग कह्या छे ते ते ते गुणस्थाने नियम होय छे खरां, पण तेना लक्षे मोक्ष थतो नथी, पण तेना लक्षे राग थाय छे, तेथी ते तरफनो झुकाव अने विकल्प छोडी आत्मामां लीन थवा माटे आ श्लोक कह्यो छे. ८७.

‘वर्णोमां ब्राह्मण गुरु छे, तेथी ते ज परमपदने योग्य छे’ एवुं जे बोले छे तेओ पण मुक्ति योग्य नथी, ते कहे छेः १. धर्मेण भवति लिंगं न लिंगमात्रेण धर्मसंप्राप्तिः

जानीहि भावधर्म किं ते लिंगेन कर्तव्यम् ।।।। (लिंग पाहुडगा. २)