Samadhitantra-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 88-89.

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समाधितंत्र१५१
जातिर्देहाश्रिता दृष्टा देह एवात्मनो भवः
न मुच्यन्ते भवात्तस्मात्ते ये जातिकृताग्रहाः ।।८८।।
टीकाजातिर्ब्राह्मणादिर्देहाश्रितेत्यादि सुगमं ।।८८।।
तर्हिं ब्राह्मणादिजातिविशिष्टो निर्वाणादिदीक्षया दीक्षितो मुक्तिं प्राप्नोतीति वदन्तं प्रत्याह
जातिलिंगविकल्पेन येषां च समयाग्रहः
तेऽपि न प्राप्नुवन्त्येव परमं पदमात्मनः ।।८९।।
श्लोक ८८

अन्वयार्थ :(जातिः) जाति (देहाश्रिता दृष्टा) शरीरने आश्रित जोवामां आवे छे अने (देहः एव) देह ज (देहमां आत्मबुद्धि ज) (आत्मनः भवः) आत्मानो भव (संसार) छे; (तस्मात्) तेथी (ये) जेमने (जातिकृताग्रहाः) मुक्तिनी प्राप्ति माटे जातिनो हठाग्रह छे (ते अपि) तेओ (भवात् न मुच्यन्ते) संसारथी मुक्त थता नथी.

टीका :ब्राह्मणादि देहाश्रित छे, इत्यादि अर्थ सुगम छे (अर्थात् समजवो सहेलो छे).

भावार्थ :लिंगनी माफक जाति पण देहाश्रित छे अने देहमां आत्मबुद्धि ते संसार छे, तेथी जेओ मुक्ति माटे जातिनो आग्रह राखे छे अर्थात् जातिने ज मुक्तिनुं मूळ माने छे तेओ पण संसारथी छूटता नथी, कारण के तेओ संसारना आग्रही छे.

जाति पण मुनि अवस्थामां, जे प्रकारनी आगममां कही छे ते प्रमाणे, नियमा होय छे; तेनाथी विरुद्ध जाति भावलिंगी मुनिने होती नथी. ते जातिथी के ते तरफना वलण के विकल्पथी मोक्ष थतो नथी, किन्तु राग उत्पन्न थाय छे. माटे ते तरफनुं वलण छोडी आत्मसन्मुख थई तेमां लीन थवाथी मोक्ष थाय छे एम आ श्लोक उपरथी समजवुं. ८८.

त्यारे तो ब्राह्मणादि जातिविशिष्ट निर्वाणादिनी दीक्षाथी दीक्षित थईने मुक्ति प्राप्त करी शके एवुं बोलनार प्रति कहे छेः

तनने आश्रित जाति छे, तन जीवनो संसार;
तेथी जात्याग्रही तणो छूटे नहि संसार. ८८.
जाति-लिंग-विकल्पथी आगम-आग्रह होय,
तेने पण पद परमनी संप्राप्ति नहि होय. ८९.