अन्वयार्थ : — (जातिः) जाति (देहाश्रिता दृष्टा) शरीरने आश्रित जोवामां आवे छे अने (देहः एव) देह ज (देहमां आत्मबुद्धि ज) (आत्मनः भवः) आत्मानो भव (संसार) छे; (तस्मात्) तेथी (ये) जेमने (जातिकृताग्रहाः) मुक्तिनी प्राप्ति माटे जातिनो हठाग्रह छे (ते अपि) तेओ (भवात् न मुच्यन्ते) संसारथी मुक्त थता नथी.
टीका : — ब्राह्मणादि देहाश्रित छे, इत्यादि अर्थ सुगम छे (अर्थात् समजवो सहेलो छे).
भावार्थ : — लिंगनी माफक जाति पण देहाश्रित छे अने देहमां आत्मबुद्धि ते संसार छे, तेथी जेओ मुक्ति माटे जातिनो आग्रह राखे छे अर्थात् जातिने ज मुक्तिनुं मूळ माने छे तेओ पण संसारथी छूटता नथी, कारण के तेओ संसारना आग्रही छे.
जाति पण मुनि अवस्थामां, जे प्रकारनी आगममां कही छे ते प्रमाणे, नियमा होय छे; तेनाथी विरुद्ध जाति भावलिंगी मुनिने होती नथी. ते जातिथी के ते तरफना वलण के विकल्पथी मोक्ष थतो नथी, किन्तु राग उत्पन्न थाय छे. माटे ते तरफनुं वलण छोडी आत्मसन्मुख थई तेमां लीन थवाथी मोक्ष थाय छे एम आ श्लोक उपरथी समजवुं. ८८.
त्यारे तो ब्राह्मणादि जातिविशिष्ट निर्वाणादिनी दीक्षाथी दीक्षित थईने मुक्ति प्राप्त करी शके एवुं बोलनार प्रति कहे छेः —