१५२समाधितंत्र
टीका — जातिलिंगरूपः विकल्पो भेदस्तेन येषां शैवादिनां समयाग्रहः आगमानुबंधः उत्तमजातिविशिष्टं हि लिंग मुक्तिहेतुरित्यागमे प्रतिपादितमतस्तावन्मात्रेणैव मुक्तिरित्येवंरूपो येषामागमाभिनिवेशः तेऽपि न प्राप्नुवन्त्येव परमं पदमात्मनः ।।८९।।
अन्वयार्थ : — (येषां) जेमने (जातिलिंगविकल्पेन) जाति अने लिंगना विकल्पथी मुक्ति थाय छे एवो (समयाग्रहः) आगम संबंधी आग्रह छे (ते अपि) तेओ पण (आत्मनः परं पदं) आत्माना परम पदने (न प्राप्नुवन्ति एव) प्राप्त करी शकता ज नथी.
टीका : — जाति अने लिंगरूप विकल्प एटले भेद तेनाथी जे शैवादिने समयनो आग्रह एटले आगमनो आग्रह छे – अर्थात् उत्तम जातिविशिष्ट लिंग ज मुक्तिनुं कारण छे एवुं आगममां प्रतिपादन कर्युं छे, तेथी ते मात्रथी ज मुक्ति छे – एवो जेने आगमनो अभिनिवेश (आग्रह) छे, तेओ पण आत्माना परम पदने प्राप्त करी शकता ज नथी.
भावार्थ : — जाति अने लिंग बंने देहाश्रित छे. तेना तरफना विकल्पथी राग थाय छे, अने राग ते संसार छे. तेथी जे एवुं माने छे के आगममां जाति अने लिंगथी मोक्ष थाय छे एम प्रतिपादन कर्युं छे, ते हठाग्रही छे अने आगमना स्वरूपथी तद्दन अज्ञात छे. वीतरागी आगम तो कहे छे के वीतरागताथी ज मोक्षनी प्राप्ति थाय, अने वीतरागता थतां बाह्य लिंगादि होय खरां, पण तेना आश्रये मोक्ष न थाय, तेना विकल्पथी पण मोक्ष न थाय. जाति, लिंग ने ते संबंधी विकल्पथी मोक्ष थाय एम माननारा समयाग्रही छे – समयना जाणकार नथी.
लिंग ए मोक्षनुं साचुं कारण नथी. तेनुं प्रतिपादन करतां श्री कुन्दकुन्दाचार्ये श्री समयसारमां कह्युं छे के —
‘‘बहु प्रकारनां मुनि – लिंगोने अथवा गृही – लिंगोने ग्रहण करीने मूढ (अज्ञानी)जनो एम कहे छे के ‘आ (बाह्य) लिंग मोक्षमार्ग छे.’ परंतु लिंग मोक्षमार्ग नथी, कारण के अर्हंतदेवो देह प्रत्ये निर्मम वर्तता थका लिंगने छोडीने दर्शन – ज्ञान – चारित्रने ज सेवे छे.
जेओ बहु प्रकारनां मुनिलिंगोमां अथवा गृहस्थलिंगोमां ममकार करे छे (अर्थात् द्रव्यलिंग ज मोक्षनुं देनार छे एम माने छे), तेमणे समयसारने नथी जाण्यो.
जेओ खरेखर ‘हुं श्रमण छुं, हुं श्रमणोपासक (श्रावक) छुं’ एम द्रव्यलिंगमां ममकार वडे मिथ्या अहंकार करे छे, तेओ ‘अनादिरूढ’ (अनादिकाळथी चाल्या आवेला) व्यवहारमां