तत्प्रदप्राप्यर्थं जात्यादिविशिष्टे शरीरे निर्ममत्वसिद्धयर्थं भोगेभ्यो व्यावृत्त्यापि पुनर्मोहवशाच्छशरीर एवानुबन्धं प्रकुर्वन्तीत्याह —
टीका — यस्य शरीरस्य त्यागाय निर्ममत्वाय भोगेभ्यः स्रग्वनितादिभ्यो निवर्तन्ते । तथा यदवाप्तये यस्य परमवीतरागत्वस्यावाप्तये प्राप्तिनिमित्तं भोगेभ्यो निवर्तन्ते । प्रीतिमनुबन्धं तत्रैव शरीरे एव कुर्वन्ति द्वेषं पुनरन्यत्र परमवीतरागत्वे । के ते ? मोहिनो मोहवन्तः ।।९०।। मूढ (मोही) वर्तता थका, प्रौढ विवेकवाळा निश्चय (निश्चयनय) पर अनारूढ वर्तता थका, परमार्थसत्य (जे परमार्थ सत्यार्थ छे एवा) भगवान समयसारने देखता – अनुभवता नथी.’’१ ८९.
ते पदनी प्राप्ति अर्थे जाति आदि विशिष्ट शरीरमां निर्ममत्वनी सिद्धि माटे भोगोथी व्यावृत्त थईने (पाछो हठीने) पण फरीथी मोहवश शरीरमां ज अनुबंध (अनुराग) करे छे ते कहे छेः —
अन्वयार्थ : — (यत्त्यागाय) जेना (शरीरना) त्याग माटे अर्थात् जेनाथी ममत्व हठाववा माटे अने (यद् अवाप्तये) जेने (परम वीतरागपदने) प्राप्त करवा माटे (भोगेभ्यः) इन्द्रियोना भोगोथी (निवर्तन्ते) निवृत्ति पामे छे (तत्र एव) तेमां ज एटले शरीर अने इन्द्रियोना विषयोमां ज (मोहिनः) मोही जीवो (प्रीतिं कुर्वन्ति) प्रीति करे छे अने (अन्यत्र) बीजे एटले वीतराग पद उपर (द्वेषं कुर्वन्ति) द्वेष करे छे.
टीका : — शरीरना त्याग माटे अर्थात् तेमां निर्ममत्व माटे भोगोथी एटले माळा – वनितादिथी निवृत्त थाय छे (पाछा हठे छे) तथा जेनी प्राप्ति माटे अर्थात् जे परम वीतरागता, तेनी प्राप्ति माटे एटले प्राप्ति निमित्ते भोगोथी निवृत्त थाय छे; तेमां ज एटले आ बद्ध शरीरमां प्रीति एटले अनुबंध करे छे अने बीजे अर्थात् परम वीतरागता उपर १. श्री समयसार-गाथा-४०८, ४०९, ४१३ अने टीका.