Samadhitantra-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 90.

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समाधितंत्र१५३

तत्प्रदप्राप्यर्थं जात्यादिविशिष्टे शरीरे निर्ममत्वसिद्धयर्थं भोगेभ्यो व्यावृत्त्यापि पुनर्मोहवशाच्छशरीर एवानुबन्धं प्रकुर्वन्तीत्याह

यत्त्यागाय निवर्तन्ते भोगेभ्यो यदवाप्राप्तये
प्रीति तत्रैव कुर्वन्ति द्वेषमन्यत्र मोहिनः ।।९०।।

टीकायस्य शरीरस्य त्यागाय निर्ममत्वाय भोगेभ्यः स्रग्वनितादिभ्यो निवर्तन्ते तथा यदवाप्तये यस्य परमवीतरागत्वस्यावाप्तये प्राप्तिनिमित्तं भोगेभ्यो निवर्तन्ते प्रीतिमनुबन्धं तत्रैव शरीरे एव कुर्वन्ति द्वेषं पुनरन्यत्र परमवीतरागत्वे के ते ? मोहिनो मोहवन्तः ।।९०।। मूढ (मोही) वर्तता थका, प्रौढ विवेकवाळा निश्चय (निश्चयनय) पर अनारूढ वर्तता थका, परमार्थसत्य (जे परमार्थ सत्यार्थ छे एवा) भगवान समयसारने देखताअनुभवता नथी.’’ ८९.

ते पदनी प्राप्ति अर्थे जाति आदि विशिष्ट शरीरमां निर्ममत्वनी सिद्धि माटे भोगोथी व्यावृत्त थईने (पाछो हठीने) पण फरीथी मोहवश शरीरमां ज अनुबंध (अनुराग) करे छे ते कहे छेः

श्लोक ९०

अन्वयार्थ :(यत्त्यागाय) जेना (शरीरना) त्याग माटे अर्थात् जेनाथी ममत्व हठाववा माटे अने (यद् अवाप्तये) जेने (परम वीतरागपदने) प्राप्त करवा माटे (भोगेभ्यः) इन्द्रियोना भोगोथी (निवर्तन्ते) निवृत्ति पामे छे (तत्र एव) तेमां ज एटले शरीर अने इन्द्रियोना विषयोमां ज (मोहिनः) मोही जीवो (प्रीतिं कुर्वन्ति) प्रीति करे छे अने (अन्यत्र) बीजे एटले वीतराग पद उपर (द्वेषं कुर्वन्ति) द्वेष करे छे.

टीका :शरीरना त्याग माटे अर्थात् तेमां निर्ममत्व माटे भोगोथी एटले माळा वनितादिथी निवृत्त थाय छे (पाछा हठे छे) तथा जेनी प्राप्ति माटे अर्थात् जे परम वीतरागता, तेनी प्राप्ति माटे एटले प्राप्ति निमित्ते भोगोथी निवृत्त थाय छे; तेमां ज एटले आ बद्ध शरीरमां प्रीति एटले अनुबंध करे छे अने बीजे अर्थात् परम वीतरागता उपर १. श्री समयसार-गाथा-४०८, ४०९, ४१३ अने टीका.

जे तजवा, जे पामवा, हठे भोगथी जीव;
त्यां प्रीति, त्यां द्वेषने मोही धरे फरीय. ९०.