Samadhitantra-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 91.

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१५४समाधितंत्र

तेषां देहे दर्शनव्यापारविपर्यासं दर्शयन्नाह
अनन्तरज्ञः संधत्ते दृष्टिं पंगोर्यथाऽन्धके
संयोगात् दृष्टिमङ्गेऽपि संधत्ते तद्वदात्मनः ।।९१।।

टीकाअनन्तरज्ञो भेदाग्राहक पुरुषो यथा पङ्गोर्दष्टिमन्धके सन्धत्ते आरोपयति कस्मात् संयोगात् पंग्वन्ध्योः सम्बन्धमाश्रित्य तद्वत् तथा देहात्मनोः संयोगादात्मनो दृष्टिमंगेऽपि सन्धत्ते अंगं (गः) पश्यतीति [मन्यते मोहाभिभूतो बहिरात्मा ।।९१।। द्वेष करे छे. कोण तेओ? मोहीमोहान्ध जीवो.

भावार्थ :शरीरादि पर पदार्थोथी ममत्व हठाववा माटे परम वीतराग पदनी प्राप्ति माटे केटलाक जीवो विषयभोगोनो त्याग करी संयमना साधन अंगीकार करे छे, परंतु पाछळथी मोहवश तेओ ते ज शरीर अने विषयभोगोमां प्रीति करे छे अने संयमनां साधनो उपर द्वेष करे छे.

मोहनी आवी विचित्र लीला छे; तेथी पुरुषार्थ द्रढ करी जीव मोहमां न फसाय ते माटे आचार्यनो आ श्लोक द्वारा उपदेश छे. ९०.

तेमनो देहमां दर्शनव्यापारनो विपर्यास (विपरीतता) बतावीने कहे छेः

श्लोक ९१

अन्वयार्थ :(अनन्तरज्ञः) तफावतनेभेदने नहि जाणनार पुरुष (यथा) (संयोगात्) संयोगना कारणे भ्रममां पडी (पंगोः दृष्टिं) लंगडानी द्रष्टिने पुरुषमां (अन्धके) अंध (संधत्ते)आरोपे छे, (तद्वत्) तेम (आत्मनः दृष्टिं) आत्मानी द्रष्टिने (अङ्गे अपि) शरीरमां पण (संधत्ते) आरोपे छे.

टीका :अनन्तरने (भेदने) नहि जाणनारभेदने ग्रहण नहि करनार पुरुष, जेम लंगडानी द्रष्टिने अंध पुरुषमां जोडे छेआरोपे छे, शाथी? संयोगथी अर्थात् लंगडा अने अंधपुरुषना संबंधनो आश्रय करीने, तेम देह अने आत्माना संयोगने लीधे, आत्मानी द्रष्टिने शरीरमां पण आरोपे छे, अर्थात् मोहाभिभूत बहिरात्मा माने छे के ‘शरीर देखे छे.’

अज्ञ पंगुनी द्रष्टिने माने अंधामांय;
अभेदज्ञ जीवद्रष्टिने माने छे तनमांय. ९१.