भावार्थ : — शरीर अने आत्माना संयोग – संबंधने लीधे अज्ञानीने भ्रम थाय छे के शरीरनी क्रिया जीव करे छे. आचार्य आ वात द्रष्टांतथी समजावे छे. अंध, लंगडाने खभा उपर बेसाडी रस्ते जई रह्यो छे. ठीक रस्ते जवा माटे लंगडो अंधाने इशारो करे छे. लंगडा – आंधळानुं – बंनेनुं संयोगरूप जोडुं छे. मार्गे चालवामां लंगडानी द्रष्टि अने आंधळाना पग काम करे छे. आ बंनेनी संयुक्त गतिनो भेद नहि जाणनार कोई मंद द्रष्टिवाळो पुरुष एम समजे छे के आ अंधो ज सावधानीपूर्वक जोईने चाली रह्यो छे, पण तेनो ए भ्रम छे; तेवी रीते आत्मा अने शरीरना संयोग संबंधनो भेद नहि जाणनार बहिरात्मा शरीरनी क्रियाने आत्मानी क्रिया समजे छे अर्थात् शरीरने ज आत्मा माने छे. ए तेनो तेवो ज भ्रम छे.
जेम आंधळानी गतिमां लंगडानी द्रष्टि निमित्तमात्र छे – अर्थात् जेम ए गति अने द्रष्टि वच्चे कर्ताकर्म संबंध नथी पण मात्र निमित्त – नैमितिक संबंध छे – तेम शरीरनी गतिनो आत्मा कर्ता नथी. बंने वच्चे कोई वखते मात्र निमित्त – नैमित्तिक संबंध होय छे, परंतु कर्ताकर्म संबंध होतो नथी. अज्ञानीने संयोग – संबंधने लीधे बंनेना एकपणानो भ्रम थई जाय छे अने तेथी ते शरीर अने आत्माने एक गणी शरीरनी क्रिया जीव करे छे एम माने छे.
निमित्त होवा छतां, निमित्तथी निरपेक्ष उपादाननुं परिणमन होय छे.१ ९१.
अंतरात्मा शुं करे छे ते कहे छेः —
अन्वयार्थ : — (दृष्टभेदः) जे भेद जाणे छे ते (यथा) जेम (पंगोः दृष्टिं) लंगडानी द्रष्टिने (अंधे) अंध पुरुषमां (न योजयेत्) योजतो नथी – आरोपतो नथी (तथा) तेम १. वज्झ कारण निरपेक्खो वथ्थु परिणामो । वस्तुनुं परिणमन बाह्य कारणथी निरपेक्ष होय छे. (जुओ-जयधवल-पेरा – २४४, पृ. ११७; पुस्तक ७.)