Samadhitantra-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 92.

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समाधितंत्र१५५
अन्तरात्मा किं करोतीत्याह
दृष्टभेदो यथा दृष्टिं पङ्गोरन्धे न योजयेत्
तथा न योजयेद्देहे दृष्टात्मा दृष्टिमात्मनः ।।९२।।

भावार्थ :शरीर अने आत्माना संयोगसंबंधने लीधे अज्ञानीने भ्रम थाय छे के शरीरनी क्रिया जीव करे छे. आचार्य आ वात द्रष्टांतथी समजावे छे. अंध, लंगडाने खभा उपर बेसाडी रस्ते जई रह्यो छे. ठीक रस्ते जवा माटे लंगडो अंधाने इशारो करे छे. लंगडा आंधळानुंबंनेनुं संयोगरूप जोडुं छे. मार्गे चालवामां लंगडानी द्रष्टि अने आंधळाना पग काम करे छे. आ बंनेनी संयुक्त गतिनो भेद नहि जाणनार कोई मंद द्रष्टिवाळो पुरुष एम समजे छे के आ अंधो ज सावधानीपूर्वक जोईने चाली रह्यो छे, पण तेनो ए भ्रम छे; तेवी रीते आत्मा अने शरीरना संयोग संबंधनो भेद नहि जाणनार बहिरात्मा शरीरनी क्रियाने आत्मानी क्रिया समजे छे अर्थात् शरीरने ज आत्मा माने छे. ए तेनो तेवो ज भ्रम छे.

विशेष

जेम आंधळानी गतिमां लंगडानी द्रष्टि निमित्तमात्र छेअर्थात् जेम ए गति अने द्रष्टि वच्चे कर्ताकर्म संबंध नथी पण मात्र निमित्तनैमितिक संबंध छेतेम शरीरनी गतिनो आत्मा कर्ता नथी. बंने वच्चे कोई वखते मात्र निमित्तनैमित्तिक संबंध होय छे, परंतु कर्ताकर्म संबंध होतो नथी. अज्ञानीने संयोगसंबंधने लीधे बंनेना एकपणानो भ्रम थई जाय छे अने तेथी ते शरीर अने आत्माने एक गणी शरीरनी क्रिया जीव करे छे एम माने छे.

निमित्त होवा छतां, निमित्तथी निरपेक्ष उपादाननुं परिणमन होय छे. ९१.

अंतरात्मा शुं करे छे ते कहे छेः

श्लोक ९२

अन्वयार्थ :(दृष्टभेदः) जे भेद जाणे छे ते (यथा) जेम (पंगोः दृष्टिं) लंगडानी द्रष्टिने (अंधे) अंध पुरुषमां (न योजयेत्) योजतो नथीआरोपतो नथी (तथा) तेम १. वज्झ कारण निरपेक्खो वथ्थु परिणामो वस्तुनुं परिणमन बाह्य कारणथी निरपेक्ष होय छे. (जुओ-जयधवल-पेरा२४४, पृ. ११७; पुस्तक ७.)

विज्ञ न माने पंगुनी द्रष्टि अंधामांय;
निजज्ञ त्यम माने नहीं जीवद्रष्टि तनमांय. ९२.
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