Samadhitantra-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१५६समाधितंत्र

टीकादृष्टभेदः पंग्बन्धयोः प्रतिपन्नभेदः पुरुषो यथा पंगोर्दष्टिमन्धे न योजयेत् तथा आत्मनो दृष्टिं देहे न योजयेत् कोऽसौ ? दृष्टात्मा देहाद्भेदेन प्रतिपन्नात्मा ।।९२।।

बहिरन्तरात्मनोः काऽवस्था भ्रान्तिः का वाऽभ्रान्तिरित्याह (दृष्टात्मा) आत्माने शरीरादिथी भिन्न अनुभवनार अन्तरात्मा (आत्मनः दृष्टिं) आत्मानी द्रष्टिनेतेना ज्ञानदर्शनस्वभावने(देहे) देहमां (न योजयेत्) आरोपतो नथीअर्थात् देह साथे एकरूप करतो नथी.

टीका :भेद जाणनार अर्थात् लंगडा अने अंधनो भेद (तफावत) जाणनार पुरुष, जेम लंगडानी द्रष्टिने अंधमां योजतो (आरोपतो) नथी, तेम ते आत्मानी द्रष्टिने देहमां आरोपतो नथी. कोण ते? द्रष्टात्माअर्थात् जेणे देहथी भेद करीने आत्मा जाण्यो छे ते (अंतरात्मा).

भावार्थ :जे आंधळा अने लंगडानो भेद बराबर जाणे छे, ते बंनेना संयोगना कारणे भ्रममां पडी लंगडानी द्रष्टिने आंधळामां आरोपतो नथीअर्थात् आंधळाने द्रष्टिहीन अने लंगडाने द्रष्टिवान समजे छे; तेवी रीते भेदज्ञानी अन्तरात्मा, आत्मा अने शरीरना संयोगसंबंधथी भ्रममां पडी कदी पण शरीरमां आत्मानी कल्पना करतो नथी, अर्थात् ते शरीरने चेतनारहित जड अने आत्माने ज्ञानदर्शनस्वरूप ज समजे छे.

विशेष

आत्मा अने शरीरनो एकक्षेत्रावगाह संबंध होवा छतां उपयोगरूप लक्षणथी आत्मा परखाय छे; जेम सोनारूपानो एकपणारूप संबंध होवा छतां, तेमना वर्णादि द्वारा ते बंने भिन्न भिन्न पारखी शकाय छे तेम.

अन्तरात्माने शरीर अने आत्माना लक्षणोनुं बराबर ज्ञान छे, तेथी ते बंनेने एकरूप अथवा एकने बीजारूप मानतो नथी. ९२.

बहिरात्मा अने अन्तरात्मानी अवस्था भ्रान्तिरूप छे अने कई अभ्रान्तिरूप छे ते कहे छेः १. सर्वार्थसिद्धिअ. २/सूत्र ८नी सं. टीका.

......तेन बन्धं प्रत्येकत्वे सत्यप्यात्मा लक्ष्यते
सुवर्णरजतयो बन्धं प्रत्येकत्वे सत्यपि वर्णादिर्भेदवत् ।।