Samadhitantra-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१५८समाधितंत्र तेषामविपर्यासात् स्वरूपसंवित्तिवैकल्यासम्भवाच्च यदि सुप्ताद्यवस्थायामप्यात्मदर्शनं स्यात्तदा जाग्रदवस्थावत्तत्राप्यात्मनः कथं सुप्तादिब्यपदेश इत्युप्युक्तम् यतस्तत्रेन्द्रियाणां स्वविषये निद्रया प्रतिबन्धात्तद्व्यपदेशो न पुनरात्मदर्शनप्रतिबन्धादिति तर्हि कस्याऽसौ विभ्रमो भवति ? अक्षीणदोषस्य बहिरात्मनः कथम्भूतस्य ? सर्वावस्थात्मदर्शिनः सर्वावस्थां बालकुमारादिलक्षणां सुप्तोन्मत्तादिरूपां चात्मेति पश्यत्येवं शीलस्य ।।९३।।

जो सुप्तादि अवस्थामां पण आत्मदर्शन होय तो जागृत अवस्थानी जेम, तेमां पण आत्माने सुप्तादिनो व्यपदेश (कथन) केवी रीते घटे? माटे ते पण अयोग्य छे.

(समाधान)त्यां इन्द्रियोने स्वविषयमां निद्राने लीधे प्रतिबंध छे, परंतु त्यां आत्मदर्शननो प्रतिबंध नथी, माटे तेनो व्यपदेश घटे छे.

त्यारे कोनी ते विभ्रमरूप लागे छे? अक्षीण दोषवाळा बहिरात्मानी. केवा (बहिरात्मानी)? सर्व अवस्थाओमां आत्मा माननारनीअर्थात् बालकुमारादिरूप अने सुप्तउन्मत्तादिरूप सर्व अवस्थाने जे आत्मा माने छे तेवा स्वभाववाळानी (बहिरात्मानी).

भावार्थ :संस्कृत टीकाकारे प्रस्तुत श्लोकने नीचेना रूपमां समजी बीजो अर्थ पण कर्यो छेः

सुप्तोन्मत्ताद्यवस्थापि विभ्रमो नात्मदर्शिनाम्
विभ्रमोऽक्षीणदोषस्य सर्वावस्थात्मदर्शनः ।।९३।।

अर्थःआत्मदर्शी पुरुषोनी निद्रावस्था अने उन्मत्तावस्था पण विभ्रमरूप होती नथी अने सर्व अवस्थाओमां आत्मा माननारनी (बहिरात्मानी)जेना मिथ्यात्वादि दोषो क्षीण थया नथी तेवानीते (निद्रावस्था अने जाग्रतावस्थादि सर्व अवस्थाओ) विभ्रमरूप छे.

जे आत्मदर्शी अन्तरात्मा छे तेने सुप्तादि अवस्था विभ्रम नथी, तो जाग्रतादि अवस्थाओ तो विभ्रमरूप केम ज होय? न ज होय, कारण के आत्मस्वरूपना द्रढतर अभ्यासना कारणे तेनुं ज्ञान ते अवस्थाओमां आत्मस्वरूपथी च्युत थतुं नथी. इन्द्रियोनी शिथिलता अने रोगादिवश कदाचित् तेने उन्मत्तता पण आवी जाय, तो पण तेना आत्मानुभव संस्कार छूटता नथीबराबर कायम ज रहे छे; परंतु अज्ञानी बहिरात्मने बाल, कुमारादिरूप तथा सुप्तउन्मत्तादिरूप सर्व अवस्थाओमां देहाध्यासआत्मबुद्धि होवाथी तेनी बधी क्रियाओ विभ्रमरूपमिथ्या छे.

अंतरात्माने निरंतर ज्ञानचेतनानुं परिणमन होवाथी बधी अवस्थाओमांओसुप्त के जाग्रत, उन्मत्त के अनुन्मत्त अवस्थामांतेनी क्रियाओ विभ्रमरूप होती नथी, परंतु