ननु सर्वावस्थात्मदर्शिनोऽप्यशेषशास्त्रपरिज्ञानान्निद्रारहितस्य मुक्तिर्भविष्यतीति वदन्तं प्रत्याह —
टीका — न मुच्यते न कर्मरहितो भवति । कोऽसौ ? देहात्मदृष्टिर्बहिरात्मा । कथम्भूतोऽपि ? विदिताशेषशास्त्रोऽपि परिज्ञाताशेषशास्त्रोऽपि देहात्मदृष्टिपर्यतः देहात्मनोर्भेदरुचिरहितो यतः । पुनरपि कथम्भूतोऽपि ? जाग्रदपि निद्रयाऽनभिभूतोऽपि । यस्तु ज्ञातात्मा परिज्ञातात्मस्वरूपः स सुप्तोन्मत्तोऽपि बहिरात्माने सर्व अवस्थाओमां निरंतर अज्ञान चेतनानुं परिणमन होवाथी तेनी बधी क्रियाओ विभ्रमरूप – मिथ्या होय छे.
आ रीते बहिरात्मा अने अन्तरात्मानी अवस्थामां मोटो फेर छे. अंतरात्मा आत्मस्वरूमां सदा जागृत रहे छे अने बहिरात्मानी एनाथी विपरीत दशा होय छे. ९३.
सर्व अवस्थाओमां आत्मा माननारनी पण, अशेष (संपूर्ण) शास्त्रोना परिज्ञानने लीधे निद्रारहित (जाग्रत) थयेलानी मुक्ति थशे? एवुं बोलनार प्रति कहे छेः —
अन्वयार्थ : — (देहात्मदृष्टिंः) शरीरमां आत्मबुद्धि राखनार बहिरात्मा (विदिताशेषशास्त्रः अपि) संपूर्ण शास्त्रोनो जाणकार होवा छतां तथा (जाग्रत अपि) जागतो होवा छतां (न मुच्यते) कर्मबंधनथी छूटतो नथी; किन्तु (ज्ञातात्मा) भेदज्ञानी – अन्तरात्मा (सुप्तोन्मत्तः अपि) निद्रावस्थामां या उन्मत्तावस्थामां होवा छतां (मुच्यते) कर्मबंधनथी मुक्त थाय छे – विशिष्ट रूपथी कर्मोनी निर्जरा करे छे.
टीका : — मुक्त थतो नथी – कर्मरहित थतो नथी. कोण ते? शरीरमां आत्मबुद्धि राखनार – बहिरात्मा केवो होवा छतां? सर्व शास्त्रोनो जाणकार होवा छतां सर्व शास्त्रोना परिज्ञानवाळो होवा छतां – , कारण के ते देहात्मद्रष्टि छे अर्थात् देह अने आत्माना भेदनी रुचि विनानो छे. वळी ते केवो (होवा छतां) छे? जागृत होवा छतां – निद्राथी अभिभूत (घेरायेलो) नहि होवा छतां.