१६०समाधितंत्र मुच्यते विशिष्टां कर्मनिर्जरां करोति दृढतराभ्यासात्सुप्ताद्यवस्थायामप्यात्मस्वरूपसंवित्त्यवैकल्यात् ।।९४।।
जे ज्ञातात्मा छे अर्थात् जेणे आत्मस्वरूप जाण्युं छे (अनुभव्युं छे) ते सुप्त अने उन्मत्त होवा छतां मुक्त थाय छे – विशिष्ट कर्म – निर्जरा करे छे, कारण के तेने द्रढतर अभ्यासने लीधे सुप्तादि अवस्थामां पण आत्मस्वरूपना संवेदनमां वैकल्य (च्युति) होतुं नथी.
भावार्थ : — जेने शरीरमां आत्मबुद्धि छे – जे शरीरने ज आत्मा माने छे एटले के शरीरनी क्रिया आत्मा करे छे एवुं माने छे – ते भले सर्व शास्त्रोनो जाणकार होय अने जागृतावस्थामां (सभान अवस्थामां) होय, तो पण भेदविज्ञानना अभावे तेने मुक्तिनी प्राप्ति थती नथी, परंतु जेने शरीर अने आत्मानुं भेदज्ञान छे अने आत्मस्वरूपना अनुभवनो द्रढतर अभ्यास छे तेवो अन्तरात्मा, निद्रावस्थामां या उन्मत्तावस्थामां होवा छतां विशिष्ट प्रकारे कर्मोनी निर्जरा करे छे कारण के तेने निरंतर ज्ञान चेतनानुं परिणमन छे. आ कर्मनिर्जरा तेनी मुक्तिना कारणरूप बने छे.
अज्ञानी जीवने अगियार अंग अने नव पूर्वनुं ज्ञान होय, पोताना शास्त्रज्ञानथी बीजाओने मुग्ध करे, प्रशंसाने पात्र बने, पण जो ते आत्मज्ञानशून्य होय तो तेनुं बधुं ज्ञान आत्महित माटे कार्यकारी नथी – बाधक छे. गधेडा उपर लादेलां शास्त्रोना बोजा समान ते ज्ञान तेने बोजारूप छे. ९४.
(सुप्तादि अवस्थाओमां पण) ते अवैकल्य (अच्युति) शा कारणे होय छे? ते कहे छेः —
अन्वयार्थ : — (यत्र एव) ज्यां ज एटले जे कोई विषयमां ज (पुंसः) पुरुषनी