टीका — यत्रैव यस्मिन्नेव विषये आहितधीः दत्तावधाना बुद्धिः । ‘‘यत्रात्महितधीरिति च पाठः यत्रात्मनो हितमुपकारस्तत्राहितधीर्बुद्धिरिति’’ स हितमुपकारक इति बुद्धिः । कस्य ? पुंसः । श्रद्धा रुचिस्तस्य तत्रैव तस्मिन्नेव विषये जायते । यत्रैव जायते श्रद्धा चित्तं तत्रैव लीयते आसक्तं भवति ।।९५।। (आहितधीः) दत्तावधानरूप बुद्धि होय छे, (तत्र एव) त्यां ज एटले ते विषयमां ज तेने (श्रद्धा जायते) श्रद्धा उत्पन्न थाय छे अने (यत्र एव) ज्यां ज एटले जे विषयमां श्रद्धा (श्रद्धा जायते) श्रद्धा उत्पन्न थाय छे (तत्र एव) त्यां ज एटले ते विषयमां ज (चित्तं लीयते) तेनुं चित्त लीन (तन्मय) थई जाय छे.
टीका : — ज्यां ज एटले जे विषयमां ज बुद्धि लागे छे अर्थात् बुद्धि दत्तावधानरूप (लग्न) होय छे – ‘‘यत्रात्महितधीरिति’ एवो पण पाठ छे, (तेनो अर्थ ए छे के) ज्यां आत्महितनी बुद्धि छे अर्थात् ज्यां आत्मानुं हित – उपकार होय छे एटले ज्यां ‘ते हितकर – उपकारक छे’ एवी बुद्धि होय छे त्यां धी एटले बुद्धि (लागे छे.) कोनी? पुरुषनी. तेनी श्रद्धा – रुचि त्यां ज एटले ते विषयमां ज उत्पन्न थाय छे. ज्यां ज श्रद्धा उत्पन्न थाय छे त्यां ज चित्त लीन थाय छे – आसक्त थाय छे.
भावार्थ : — जे विषयमां कोई पुरुषनी बुद्धि सावधानीपूर्वक लागी रहे छे, अर्थात् जे विषय तेने हितकर के उपकारक लागे छे, तेमां तेने श्रद्धा उत्पन्न थाय छे अने ज्यां श्रद्धा उत्पन्न थाय छे त्यां चित्त लीन थई जाय छे. चित्तनी आ लीनता ज सुप्त – उन्मत्त अवस्थामां पण पुरुषने ते विषयथी हठावी शकती नथी, अर्थात् ते पुरुष ते विषयथी च्युत थतो नथी, तेमां लीन रहे छे.
भेद – विज्ञान द्वारा श्रद्धापूर्वक आत्मस्वरूपना जे संस्कारो जाम्या छे तेनुं बळ कोई पण अवस्थामां – जागृत, सुप्त के उन्मत्त अवस्थामां चालु रह्या विना रहेतुं नथी; तेथी आत्मार्थीए भेदविज्ञान द्वारा आत्मस्वरूपना संवेदन माटे आत्मरुचिपूर्वक एवो अविरत प्रयत्न करवो जोईए के जेथी आत्मश्रद्धामां बाह्य कोईपण परिस्थिति विघ्नरूप थाय नहि के च्युत करे नहि. जेम – जेम स्व - पर पदार्थोना भेदविज्ञान द्वारा आत्मानुं उत्तम स्वरूप, संवेदनमां विकसित थतुं जाय छे, तेम तेम सहज प्राप्त रमणीय पंचेन्द्रियना विषयो पण रुचता नथी, अर्थात् तेमना प्रति उपेक्षा अने उदासीनता उत्पन्न थाय छे.१ ९५. १. यथा यथा समायाति संवित्तौ तत्त्वमुत्तमम् ।