Samadhitantra-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 96.

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१६२समाधितंत्र

क्व पुनरनासक्तं चित्तं भवतीत्याह
यत्रानाहितधीः पुंसः श्रद्धा तस्मान्निवर्तते
यस्मान्निवर्तते श्रद्धा कुतश्चित्तस्य तल्लयः ।।९६।।

टीकायत्र यस्मिन्विषये अनाहितधीरदत्तावधाना बुद्धिः ‘‘यत्रैवाहितधीरिति च पाठः यत्र च अहितधीरनुपकारकबुद्धिः ’’ कस्य ? पुंसः तस्माद्विषयात्सकाशात् श्रद्धा निवर्तते यस्मान्निवर्तते श्रद्धा कुतश्चित्तस्य तल्लयः तस्मिन् विषये लय आसक्तिस्तल्लयः कुतो नैव कुतश्चिदपि ।।९६।।

वळी चित्त क्यां अनासक्त होय छे ते कहे छेः

श्लोक ९६

अन्वयार्थ :(यत्र) ज्यां एटले जे विषयमां (पुंसः) पुरुषनी (अनाहित धीः) बुद्धि सावधानरूप होती नथी, (तस्मात्) तेनाथी (श्रद्धा) श्रद्धा, (निवर्तते) हठी जाय छे ऊठी जाय छे; अने (यस्मात्) जेनाथी (श्रद्धा) श्रद्धा (निवर्तते) हठी जाय छे ते विषयमां (चित्तस्य) चित्तनी (तल्लयः कुतः) लीनता केवी रीते होई शके? अर्थात् होई शके नहि.

टीका :ज्यां एटले जे विषयमां बुद्धि संलग्न होती नथी अर्थात् बुद्धि दत्तावधानरूप होती नथी,‘यत्रैवाहितधीरिति’ एवो पण पाठ छे, तेनो अर्थ ए छे केज्यां अहित बुद्धि एटले अनुपकारक बुद्धि होय छेकोनी? पुरुषनी, ते विषयथी श्रद्धा पाछी फरे छे. जेनाथी श्रद्धा पाछी फरे, ते विषयमां चित्तनी लीनता केम होई शके? ते विषयमां चित्तनो लय एटले आसक्ति क्यांथी थाय? क्यांयथी पण नहि.

भावार्थ :जे वस्तुने पुरुष हितकारी समजतो नथी ते वस्तुमां तेने रुचि उत्पन्न थती नथी अने जे वस्तुमां रुचि न होय ते वस्तुमां तेनुं मन केवी रीते लागे? न ज लागे.

अज्ञानी जीवोने इन्द्रियोना विषयो इष्ट लागे छेहितकारी लागे छे, तेथी तेमनी रुचि तेमां उत्पन्न थाय छे अने मन तेमां लागे छे; ज्ञानीने ते विषयो अनिष्ट लागता नथी, पण ते प्रत्येनो राग अनिष्टअहितकारी लागे छे, तेथी तेनी रुचि ते तरफथी हठे छे अने तेमां मन लागतुं नथी. ते विषयो प्रत्ये उदासीन रहे छे.

ज्यां नहि मतिनी मग्नता, तेनी न होय प्रतीत;
जेनी न होय प्रतीत त्यां केम थाय मन लीन? ९६.