Samadhitantra-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१७०समाधितंत्र वा योगिनां दुःखं न भवति आनन्दात्मकस्वरूपसंवित्तौ तेषां तत्प्रभवदुःखसंवेदना-सम्भवात् ।।१००।। कारण के आनंदात्मक स्वरूपना संवेदनमां तेमने तेनाथी उत्पन्न थतां दुःखना वेदननो अभाव छे.

भावार्थ :‘चार्वाकमत’ अनुसार जीवतत्त्व भूत ज छेअर्थात् पृथ्वी, जल, अग्नि अने वायुए भूतचतुष्टयथी उत्पन्न थाय छे. जो भूतचतुष्टयथी उत्पन्न थयेला शरीरने ज आत्मा मानवामां आवे, तो शरीरना नाशने ज मोक्ष मानवानो प्रसंग आवे अने तेथी मोक्ष अयत्नसाध्य रहे; निर्वाण माटे अन्य कोई पुरुषार्थनी जरूर रहे नहि. माटे शरीरनो नाश थतां आत्मानो अभाव मानवो अने आत्माना अभावने मोक्ष मानवोएवी चार्वाकोनी जीवात्मा संबंधी कल्पना भ्रममूलकमिथ्या छे.

‘सांख्यमतानुसार’ आत्मा भूत ज अर्थात् सर्वथा स्वभावसिद्ध शुद्धस्वरूप ज छे. तेने सर्व अवस्थाओमां शुद्ध ज माने छे. निर्वाण माटे सम्यक्ज्ञान, ध्यान, तपादिरूप पुरुषार्थनी तेमने आवश्यकता नहि जणाती होवाथी, तेमना मते मोक्ष अयत्नसाध्य छे. माटे सांख्यनी कल्पना पण युक्तिसंगत नथी.

‘जैनमतानुसार’ स्वरूपसंवेदनात्मक चित्तवृत्तिना निरोधना द्रढ अभ्यास द्वारा सर्व विभाव परिणतिने हठावी शुद्धात्मस्वरूपमां स्थिरतारूप निर्वाण ‘यत्नसाध्य’ छे. अने तेवा प्रकारना आत्मस्वरूपनो अनुभव करनारने कर्मनो अभाव स्वयं थवाथी निर्वाणनी सिद्धि कर्म अपेक्षाए प्रयत्न विना अर्थात् ‘अयत्नसाध्य’ थाय छे, केम के कर्म पुद्गल छे. तेनी अवस्था जीव करी शकतो नथी; तेथी तेना अभाव माटे जीवने कोई प्रयत्न करवो पडतो नथी.

योगीजनोने, अति उग्र तप या ध्यानादि करती वखते कोई पण प्रकारनो खेद के दुःख थतुं नथी, परंतु पोताना लक्ष्यनी सिद्धि थती जोई तपध्यानादि करवामां आनंद माने छे. तेओ शरीरने आत्माथी भिन्न समजे छे, तेथी शरीर कृश थतां तेओ खेद खिन्न थता नथी तथा उपसर्ग समये पोताना साम्यभावनी स्थिरताने छोडता नथी.

‘‘जेम सुवर्ण, अग्निथी तपावा छतां तेना सुवर्णपणाने छोडतुं नथी, तेम ज्ञानी कर्मना उदये तप्त होवा छतां ते पोताना ज्ञानीपणाने छोडतो नथी.’’ १००. १.ज्यम अग्नितप्त सुवर्ण पण निज स्वर्णभाव नहि तजे, त्यम कर्मउदये तप्त पण ज्ञानी न ज्ञानीपणुं तजे. (१८४)

(श्री समयसार गु. गाथा१८४)