१७२समाधितंत्र
नन्वेव प्रसिद्धस्याप्यनाद्यनिधनस्यात्मनो मुक्त्यर्थं दुर्द्धरानुष्ठानक्लेशो व्यर्थो ज्ञानभावनामात्रैणैव मुक्तिसिद्धेरित्याशङ्कयाह —
भावार्थ : — स्वप्नमां शरीरनो नाश जोवा छतां आत्मानो नाश थतो नथी तो पण आत्माना नाशनो भ्रम (विपरीत प्रतिभास) थाय छे; तेम जाग्रत – अवस्थामां पण शरीरनो नाश जोवा छतां आत्माना विनाशनो भ्रम थाय छे. बंने अवस्थाओमां जे भ्रम थाय छे ते समान छे. तेमां कांई तफावत नथी. परमार्थ द्रष्टिए जोवामां आवे तो स्वप्नमां मनुष्यना शरीरनो अने तेना आत्मानो नाश थयो नथी; तेम जाग्रत अवस्थामां पण मरणथी मनुष्यना शरीरनो अने तेमां रहेला आत्मानो नाश थतो नथी, कारण के दरेक द्रव्य सत् छे. सत्नो कदी नाश थतो नथी, फक्त तेनी पर्यायमां फेरफार थाय छे. एक पर्यायनो व्यय, बीजी पर्यायनो उत्पाद अने ते बंनेमां द्रव्यनुं ध्रौव्यरूपे कायम रहेवुं – एवी वस्तुस्थिति छे.
आत्मा एक चेतन, अमूर्तिक, अविनाशी पदार्थ छे. तेना विनाशनी कल्पना करवी ए नितान्त भ्रम छे. संसार – अवस्थामां शरीर साथे आत्मानो परस्पर एकक्षेत्रावगाहरूप संयोग संबंध छे, पण अज्ञानीने ते बंनेनुं भेदविज्ञान नहि होवाथी बंनेने एकरूप माने छे; तेथी शरीररूप पुद्गल – पर्यायनो व्यय जोई तेमां संयोगरूपे रहेला आत्मानो पण भ्रमथी विनाश माने छे; परंतु झूंपडी बळी जतां तेमां रहेलुं आकाश कांई बळी जतुं नथी, तेम शरीरनो नाश थतां तेमां रहेला आत्मानो नाश थतो नथी. १०१.
अनादिनिधन आत्मा प्रसिद्ध होवा छतां तेनी मुक्ति माटे दुर्द्धर तपश्चरणरूप क्लेश करवो व्यर्थ छे, कारण के ज्ञानभावनामात्रथी ज मुक्तिनी सिद्धि छे एवी आशंका करी कहे छेः — ✽