कहानजैनशास्त्रमाळा ]
गाथार्थः — [यः] जे पुरुष [स्तेयादीन् अपराधान्] चोरी आदि अपराधो [करोति] करे छे [सः तु] ते ‘[जने विचरन्] लोकमां फरतां [मा] रखे [केन अपि] मने कोई [चौरः इति] चोर जाणीने [बध्ये] बांधशे – पकडशे’ एम [शङ्कितः भ्रमति] शंकित फरे छे; [यः] जे पुरुष [अपराधान्] अपराध [न करोति] करतो नथी [सः तु] ते [जनपदे] लोकमां [निश्शङ्कः भ्रमति] निःशंक फरे छे, [यद्] कारण के [तस्य] तेने [बद्धुं चिन्ता] बंधावानी चिंता [कदाचित् अपि] कदापि [न उत्पद्यते] ऊपजती नथी. [एवम्] एवी रीते [चेतयिता] अपराधी आत्मा ‘[सापराधः अस्मि] हुं अपराधी छुं [बध्ये तु अहम्] तेथी हुं बंधाईश’ एम [शङ्कितः] शंकित होय छे, [यदि पुनः] अने जो [निरपराधः] निरपराधी (आत्मा) होय तो ‘[अहं न बध्ये] हुं नहि बंधाउं’ एम [निश्शङ्कः] निःशंक होय छे.
टीकाः — जेम आ जगतमां जे पुरुष, परद्रव्यनुं ग्रहण जेनुं लक्षण छे एवो अपराध करे छे तेने ज बंधनी शंका थाय छे अने जे अपराध करतो नथी तेने बंधनी शंका थती