Samaysar-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 304-305.

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समयसार
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-

तं न करोति तस्य सा न सम्भवति; तथात्मापि य एवाशुद्धः सन् परद्रव्यग्रहणलक्षणमपराधं करोति तस्यैव बन्धशङ्का सम्भवति, यस्तु शुद्धः संस्तं न करोति तस्य सा न सम्भवतीति नियमः अतः सर्वथा सर्वपरकीयभावपरिहारेण शुद्ध आत्मा गृहीतव्यः, तथा सत्येव निरपराधत्वात्

को हि नामायमपराधः ?
संसिद्धिराधसिद्धं साधियमाराधियं च एयट्ठं
अवगदराधो जो खलु चेदा सो होदि अवराधो ।।३०४।।
जो पुण णिरावराधो चेदा णिस्संकिओ उ सो होइ
आराहणाइ णिच्चं वट्टेइ अहं ति जाणतो ।।३०५।।

नथी, तेम आत्मा पण जे अशुद्ध वर्ततो थको, परद्रव्यनुं ग्रहण जेनुं लक्षण छे एवो अपराध करे छे तेने ज बंधनी शंका थाय छे अने जे शुद्ध वर्ततो थको अपराध करतो नथी तेने बंधनी शंका थती नथीएवो नियम छे. माटे सर्वथा सर्व पारका भावोना परिहार वडे (अर्थात् परद्रव्यना सर्व भावोने छोडीने) शुद्ध आत्माने ग्रहण करवो, कारण के एम थाय त्यारे ज निरपराधपणुं थाय छे.

भावार्थःजो माणस चोरी आदि अपराध करे तो तेने बंधननी शंका थाय; निरपराधने शंका शा माटे थाय? तेवी ज रीते जो आत्मा परद्रव्यना ग्रहणरूप अपराध करे तो तेने बंधनी शंका थाय ज; जो पोताने शुद्ध अनुभवे, परने न ग्रहे, तो बंधनी शंका शा माटे थाय? माटे परद्रव्यने छोडी शुद्ध आत्मानुं ग्रहण करवुं. त्यारे ज निरपराध थवाय छे.

हवे पूछे छे के आ ‘अपराध’ एटले शुं? तेना उत्तरमां अपराधनुं स्वरूप कहे छेः

संसिद्धि, सिद्धि, राध, आराधित, साधितएक छे,
ए राधथी जे रहित छे ते आतमा अपराध छे; ३०४.
वळी आतमा जे निरपराधी ते निःशंकित होय छे,
वर्ते सदा आराधनाथी, जाणतो ‘हुं’ आत्मने. ३०५.

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