Samaysar-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


Page 445 of 642
PDF/HTML Page 476 of 673

 

कहानजैनशास्त्रमाळा ]

मोक्ष अधिकार
४४५
संसिद्धिराधसिद्धं साधितमाराधितं चैकार्थम्
अपगतराधो यः खलु चेतयिता स भवत्यपराधः ।।३०४।।
यः पुनर्निरपराधश्चेतयिता निश्शङ्कितस्तु स भवति
आराधनया नित्यं वर्तते अहमिति जानन् ।।३०५।।

परद्रव्यपरिहारेण शुद्धस्यात्मनः सिद्धिः साधनं वा राधः अपगतो राधो यस्य चेतयितुः सोऽपराधः अथवा अपगतो राधो यस्य भावस्य सोऽपराधः, तेन सह यश्चेतयिता वर्तते स सापराधः स तु परद्रव्यग्रहणसद्भावेन शुद्धात्मसिद्धयभावाद्बन्धशङ्कासम्भवे सति स्वयमशुद्धत्वादनाराधक एव स्यात् यस्तु निरपराधः स समग्रपरद्रव्यपरिहारेण शुद्धात्मसिद्धिसद्भावाद्बन्धशङ्काया असम्भवे सति उपयोगैकलक्षणशुद्ध आत्मैक एवाहमिति

गाथार्थः[संसिद्धिराधसिद्धम्] संसिद्धि, *राध, सिद्ध, [साधितम् आराधितं च] साधित अने आराधित[एकार्थम्] ए शब्दो एकार्थ छे; [यः खलु चेतयिता] जे आत्मा [अपगतराधः] ‘अपगतराध’ अर्थात् राधथी रहित छे [सः] ते आत्मा [अपराधः] अपराध [भवति] छे.

[पुनः] वळी [यः चेतयिता] जे आत्मा [निरपराधः] निरपराध छे [सः तु] ते [निश्शङ्कितः भवति] निःशंक होय छे; [अहम् इति जानन्] ‘शुद्ध आत्मा ते ज हुं छुं’ एम जाणतो थको [आराधनया] आराधनाथी [नित्यं वर्तते] सदा वर्ते छे.

टीकाःपरद्रव्यना परिहार वडे शुद्ध आत्मानी सिद्धि अथवा साधन ते राध. जे आत्मा ‘अपगतराध’ अर्थात् राध रहित होय ते आत्मा अपराध छे. अथवा (बीजो समासविग्रह आ प्रमाणे छेः) जे भाव राध रहित होय ते भाव अपराध छे; ते अपराध सहित जे आत्मा वर्ततो होय ते आत्मा सापराध छे. ते आत्मा, परद्रव्यना ग्रहणना सद्भाव वडे शुद्ध आत्मानी सिद्धिना अभावने लीधे बंधनी शंका थती होईने स्वयं अशुद्ध होवाथी, अनाराधक ज छे. अने जे आत्मा निरपराध छे ते, समग्र परद्रव्यना परिहार वडे शुद्ध आत्मानी सिद्धिना सद्भावने लीधे बंधनी शंका नहि थती होवाथी ‘उपयोग ज जेनुं एक लक्षण छे एवो एक शुद्ध आत्मा ज हुं छुं’ एम निश्चय करतो थको शुद्ध आत्मानी सिद्धि

* राध = आराधना; प्रसन्नता; कृपा; सिद्धि; पूर्णता; सिद्ध करवुं ते; पूर्ण करवुं ते.