निश्चिन्वन् नित्यमेव शुद्धात्मसिद्धिलक्षणयाराधनया वर्तमानत्वादाराधक एव स्यात् ।
स्पृशति निरपराधो बन्धनं नैव जातु ।
भवति निरपराधः साधु शुद्धात्मसेवी ।।१८७।।
ननु किमनेन शुद्धात्मोपासनप्रयासेन ? यतः प्रतिक्रमणादिनैव निरपराधो
भवत्यात्मा; सापराधस्याप्रतिक्रमणादेस्तदनपोहकत्वेन विषकुम्भत्वे सति प्रतिक्रमणा-
जेनुं लक्षण छे एवी आराधनाथी सदाय वर्ततो होवाथी, आराधक ज छे.
भावार्थः — संसिद्धि, राध, सिद्धि, साधित अने आराधित — ए शब्दोनो अर्थ एक ज छे. अहीं शुद्ध आत्मानी सिद्धि अथवा साधननुं नाम ‘राध’ छे. जेने ते राध नथी ते आत्मा सापराध छे अने जेने ते राध छे ते आत्मा निरपराध छे. जे सापराध छे तेने बंधनी शंका थाय छे माटे ते स्वयं अशुद्ध होवाथी अनाराधक छे; अने जे निरपराध छे ते निःशंक थयो थको पोताना उपयोगमां लीन होय छे तेथी तेने बंधनी शंका नथी, माटे ‘शुद्ध आत्मा ते ज हुं छुं’ एवा निश्चयपूर्वक वर्ततो थको सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र अने तपना एक भावरूप निश्चय आराधनानो आराधक ज छे.
हवे आ अर्थनुं कळशरूप काव्य कहे छेः —
श्लोकार्थः — [सापराधः] सापराध आत्मा [अनवरतम्] निरंतर [अनन्तैः] अनंत पुद्गलपरमाणुरूप कर्मोथी [बध्यते] बंधाय छे; [निरपराधः] निरपराध आत्मा [बन्धनम्] बंधनने [जातु] कदापि [स्पृशति न एव] स्पर्शतो नथी ज. [अयम्] जे सापराध आत्मा छे ते तो [नियतम् ] नियमथी [स्वम् अशुद्धं भजन् ] पोताने अशुद्ध सेवतो थको [सापराधः] सापराध छे; [निरपराधः] निरपराध आत्मा तो [साधु] भली रीते [शुद्धात्मसेवी भवति] शुद्ध आत्मानो सेवनार होय छे. १८७.
(हवे व्यवहारनयावलंबी अर्थात् व्यवहारनयने अवलंबनार तर्क करे छे केः — ) ‘‘एवो शुद्ध आत्मानी उपासनानो प्रयास (महेनत) करवानुं शुं काम छे? कारण के प्रतिक्रमण आदिथी ज आत्मा निरपराध थाय छे; केम के सापराधने, जे अप्रतिक्रमण आदि छे ते, अपराधने दूर करनारां नहि होवाथी, विषकुंभ छे, माटे जे प्रतिक्रमण आदि छे ते, अपराधने दूर करनारां
४४६