ज्ञानादन्यत्रेदमहमिति चेतनम् अज्ञानचेतना । सा द्विधा — कर्मचेतना कर्मफलचेतना च । तत्र ज्ञानादन्यत्रेदमहं करोमीति चेतनं कर्मचेतना; ज्ञानादन्यत्रेदं वेदयेऽहमिति चेतनं कर्मफलचेतना । सा तु समस्तापि संसारबीजं; संसारबीजस्याष्टविधकर्मणो बीजत्वात् । ततो मोक्षार्थिना पुरुषेणाज्ञानचेतनाप्रलयाय सकलकर्मसंन्यासभावनां सकलकर्मफलसंन्यासभावनां च नाटयित्वा स्वभावभूता भगवती ज्ञानचेतनैवैका नित्यमेव नाटयितव्या ।
तत्र तावत्सकलकर्मसंन्यासभावनां नाटयति —
टीकाः — ज्ञानथी अन्यमां ( – ज्ञान सिवाय अन्य भावोमां) एम चेतवुं (अनुभववुं) के ‘आ हुं छुं’, ते अज्ञानचेतना छे. ते बे प्रकारे छे — कर्मचेतना अने कर्मफळचेतना. तेमां, ज्ञानथी अन्यमां (अर्थात् ज्ञान सिवाय अन्य भावोमां) एम चेतवुं के ‘आने हुं करुं छुं’, ते कर्मचेतना छे; अने ज्ञानथी अन्यमां एम चेतवुं के ‘आने हुं भोगवुं छुं’, ते कर्मफळचेतना छे. (एम बे प्रकारे अज्ञानचेतना छे.) ते समस्त अज्ञानचेतना संसारनुं बीज छे; कारण के संसारनुं बीज जे आठ प्रकारनुं (ज्ञानावरणादि) कर्म, तेनुं ते अज्ञानचेतना बीज छे (अर्थात् तेनाथी कर्म बंधाय छे). माटे मोक्षार्थी पुरुषे अज्ञानचेतनानो प्रलय करवा माटे सकळ कर्मना संन्यासनी (त्यागनी) भावनाने तथा सकळ कर्मफळना संन्यासनी भावनाने नचावीने, स्वभावभूत एवी भगवती ज्ञानचेतनाने ज एकने सदाय नचाववी.
तेमां प्रथम, सकळ कर्मना संन्यासनी भावनाने नचावे छेः —
(त्यां प्रथम, काव्य कहे छेः — )
श्लोकार्थः — [त्रिकालविषयं] त्रणे काळना (अर्थात् अतीत, वर्तमान अने अनागत काळ संबंधी) [सर्वं कर्म] समस्त कर्मने [कृत-कारित-अनुमननैः] कृत-कारित-अनुमोदनाथी अने [मनः- वचन-कायैः] मन-वचन-कायाथी [परिहृत्य] त्यागीने [परमं नैष्कर्म्यम् अवलम्बे] हुं परम नैष्कर्म्यने ( – उत्कृष्ट निष्कर्म अवस्थाने) अवलंबुं छुं. (ए प्रमाणे, सर्व कर्मनो त्याग करनार ज्ञानी प्रतिज्ञा करे छे.) २२५.
(हवे टीकामां प्रथम, प्रतिक्रमण-कल्प अर्थात् प्रतिक्रमणनो विधि कहे छेः — )
(प्रतिक्रमण करनार कहे छे केः)
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