Samaysar-Gujarati (Devanagari transliteration). Kalash: 228-229.

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कहानजैनशास्त्रमाळा ]

सर्वविशुद्धज्ञान अधिकार
५५१
(आर्या)
प्रत्याख्याय भविष्यत्कर्म समस्तं निरस्तसम्मोहः
आत्मनि चैतन्यात्मनि निष्कर्मणि नित्यमात्मना वर्ते ।।२२८।।
इति प्रत्याख्यानकल्पः समाप्तः
(उपजाति)
समस्तमित्येवमपास्य कर्म
त्रैकालिकं शुद्धनयावलम्बी
विलीनमोहो रहितं विकारै-
श्चिन्मात्रमात्मानमथावलम्बे
।।२२९।।

श्लोकार्थः(प्रत्याख्यान करनार ज्ञानी कहे छे के) [भविष्यत् समस्तं कर्म प्रत्याख्याय] भविष्यना समस्त कर्मने पचखीने (त्यागीने), [निरस्त - सम्मोहः निष्कर्मणि चैतन्य -

आत्मनि आत्मनि आत्मना नित्यम् वर्ते।] जेनो मोह नष्ट थयो छे एवो हुं निष्कर्म (अर्थात्

सर्व कर्मोथी रहित) चैतन्यस्वरूप आत्मामां आत्माथी ज (पोताथी ज) निरंतर वर्तुं छुं.

भावार्थःनिश्चयचारित्रमां प्रत्याख्याननुं विधान एवुं छे केसमस्त आगामी कर्मोथी रहित, चैतन्यनी प्रवृत्तिरूप (पोताना) शुद्धोपयोगमां वर्तवुं ते प्रत्याख्यान. तेथी ज्ञानी आगामी समस्त कर्मोनुं प्रत्याख्यान करीने पोताना चैतन्यस्वरूपमां वर्ते छे.

अहीं तात्पर्य आ प्रमाणे जाणवुंःव्यवहारचारित्रमां तो प्रतिज्ञामां जे दोष लागे तेनुं प्रतिक्रमण, आलोचना तथा प्रत्याख्यान होय छे. अहीं निश्चयचारित्रनुं प्रधानपणे कथन होवाथी शुद्धोपयोगथी विपरीत सर्व कर्मो आत्माना दोषस्वरूप छे. ते सर्व कर्मचेतनास्वरूप परिणामोनुंत्रणे काळनां कर्मोनुंप्रतिक्रमण, आलोचना तथा प्रत्याख्यान करीने ज्ञानी सर्व कर्मचेतनाथी जुदा पोताना शुद्धोपयोगरूप आत्मानां ज्ञानश्रद्धान वडे अने तेमां स्थिर थवाना विधान वडे निष्प्रमाद दशाने प्राप्त थई, श्रेणी चडी, केवळज्ञान उपजाववानी सन्मुख थाय छे. आ, ज्ञानीनुं कार्य छे. २२८.

आ रीते प्रत्याख्यानकल्प समाप्त थयो. हवे सकळ कर्मना संन्यासनी भावनाने नचाववा विषेनुं कथन पूर्ण करतां, कळशरूप काव्य कहे छेः

श्लोकार्थः(शुद्धनयनुं आलंबन करनार कहे छे के) [इति एवम्] पूर्वोक्त रीते