Samaysar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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कहानजैनशास्त्रमाळा ]

सर्वविशुद्धज्ञान अधिकार
५९१

इति श्रीमदमृतचन्द्रसूरिविरचितायां समयसारव्याख्यामात्मख्यातौ सर्वविशुद्धज्ञानप्ररूपकः नवमोऽङ्कः ।।

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छेःआत्मामां अनंत धर्मो छे; परंतु तेमां केटलाक तो साधारण छे, तेथी तेओ अतिव्याप्तिवाळा छे, तेमनाथी आत्माने ओळखी शकाय नहि; वळी केटलाक (धर्मो) पर्यायाश्रित छेकोई अवस्थामां होय छे अने कोई अवस्थामां नथी होता, तेथी तेओ अव्याप्तिवाळा छे, तेमनाथी पण आत्मा ओळखी शकाय नहि. चेतनता जोके आत्मानुं (अतिव्याप्ति अने अव्याप्तिथी रहित) लक्षण छे, तोपण ते शक्तिमात्र छे, अद्रष्ट छे; तेनी व्यक्ति दर्शन अने ज्ञान छे. ते दर्शन अने ज्ञानमां पण ज्ञान साकार छे, प्रगट अनुभवगोचर छे; तेथी तेना द्वारा ज आत्मा ओळखी शकाय छे. माटे अहीं आ ज्ञानने ज प्रधान करीने आत्मानुं तत्त्व कह्युं छे.

अहीं एम न समजवुं के ‘आत्माने ज्ञानमात्र तत्त्ववाळो कह्यो छे तेथी एटलो ज परमार्थ छे अने अन्य धर्मो जूठा छे, आत्मामां नथी’; आवो सर्वथा एकांत करवाथी तो मिथ्याद्रष्टिपणुं थाय छे, विज्ञानाद्वैतवादी बौद्धनो अने वेदांतनो मत आवे छे; माटे आवो एकांत बाधासहित छे. आवा एकांत अभिप्रायथी कोई मुनिव्रत पण पाळे अने आत्मानुं ज्ञानमात्रनुंध्यान पण करे, तोपण मिथ्यात्व कपाय नहि; मंद कषायोने लीधे स्वर्ग पामे तो पामो, मोक्षनुं साधन तो थतुं नथी. माटे स्याद्वादथी यथार्थ समजवुं. २४६.

सरवविशुद्धज्ञानरूप सदा चिदानंद करता न भोगता न परद्रव्यभावको,
मूरत अमूरत जे आनद्रव्य लोकमांहि ते भी ज्ञानरूप नाहीं न्यारे न अभावको;
यहै जानि ज्ञानी जीव आपकुं भजै सदीव ज्ञानरूप सुखतूप आन न लगावको,
कर्म
- कर्मफलरूप चेतनाकूं दूरि टारि ज्ञानचेतना अभ्यास करे शुद्ध भावको.

आम श्री समयसारनी (श्रीमद्भगवत्कुंदकुंदाचार्यदेवप्रणीत श्री समयसार परमागमनी) श्रीमद् अमृतचंद्राचार्यदेवविरचित आत्मख्याति नामनी टीकामां सर्वविशुद्धज्ञाननो प्ररूपक नवमो अंक समाप्त थयो.

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