Samaysar-Gujarati (Devanagari transliteration). 14,15,16,17,18,19,20,21.

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समयसार
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-

शक्तिः १३ अन्याक्रियमाणान्याकारकैकद्रव्यात्मिका अकार्यकारणत्वशक्तिः १४ परात्म- निमित्तकज्ञेयज्ञानाकारग्रहणग्राहणस्वभावरूपा परिणम्यपरिणामकत्वशक्तिः १५ अन्यूनाति- रिक्तस्वरूपनियतत्वरूपा त्यागोपादानशून्यत्वशक्तिः १६ षट्स्थानपतितवृद्धिहानि- परिणतस्वरूपप्रतिष्ठत्वकारणविशिष्टगुणात्मिका अगुरुलघुत्वशक्तिः १७ क्रमाक्रमवृत्त- वृत्तित्वलक्षणा उत्पादव्ययध्रुवत्वशक्तिः १८ द्रव्यस्वभावभूतध्रौव्यव्ययोत्पादालिङ्गितसद्रश- विसद्रशरूपैकास्तित्वमात्रमयी परिणामशक्तिः १९ कर्मबन्धव्यपगमव्यञ्जितसहजस्पर्शादि- शून्यात्मप्रदेशात्मिका अमूर्तत्वशक्तिः २० सकलकर्मकृतज्ञातृत्वमात्रातिरिक्तपरिणाम-


शक्ति. १३. जे अन्यथी करातुं नथी अने अन्यने करतुं नथी एवा एक द्रव्यस्वरूप अकार्यकारणत्वशक्ति. (जे अन्यनुं कार्य नथी अने अन्यनुं कारण नथी एवुं जे एक द्रव्य ते - स्वरूप अकार्यकारणत्वशक्ति.) १४. पर अने पोते जेमनां निमित्त छे एवा ज्ञेयाकारो तथा ज्ञानाकारोने ग्रहण करवाना अने ग्रहण कराववाना स्वभावरूप परिणम्य- परिणामकत्वशक्ति. (पर जेमनां कारण छे एवा ज्ञेयाकारोने ग्रहण करवाना अने पोते जेमनुं कारण छे एवा ज्ञानाकारोने ग्रहण कराववाना स्वभावरूप परिणम्यपरिणामकत्वशक्ति.) १५. जे घटतुं - वधतुं नथी एवा स्वरूपमां नियतत्वरूप (निश्चितपणे जेमनुं तेम रहेवारूप) त्यागोपादानशून्यत्वशक्ति. १६. षट्स्थानपतित वृद्धिहानिरूपे परिणमतो, स्वरूप - प्रतिष्ठत्वना कारणरूप (वस्तुने स्वरूपमां रहेवानाकारणरूप) एवो जे विशिष्ट (खास) गुण ते - स्वरूप अगुरुलघुत्वशक्ति. [आ षट्-स्थानपतित वृद्धिहानिनुं स्वरूप ‘गोम्मटसार’ शास्त्रमांथी जाणवुं. अविभागपरिच्छेदोनी संख्यारूप षट्स्थानोमां पडतीसमावेश पामतीवस्तुस्वभावनी वृद्धिहानि जेनाथी (जे गुणथी) थाय छे अने जे (गुण) वस्तुने स्वरूपमां टकवानुं कारण छे एवो कोई गुण आत्मामां छे; तेने अगुरुलघुत्वगुण कहेवामां आवे छे. आवी अगुरुलघुत्वशक्ति पण आत्मामां छे.] १७. क्रमवृत्तिरूप अने अक्रमवृत्तिरूप वर्तन जेनुं लक्षण छे एवी उत्पादव्ययध्रुवत्वशक्ति. (क्रमवृत्तिरूप पर्याय उत्पादव्ययरूप छे अने अक्रमवृत्तिरूप गुण ध्रुवत्वरूप छे.) १८. द्रव्यना स्वभावभूत ध्रौव्य - व्यय - उत्पादथी आलिंगित (स्पर्शित), सद्रश अने विसद्रश जेनुं रूप छे एवा एक अस्तित्वमात्रमयी परिणामशक्ति. १९. कर्मबंधना अभावथी व्यक्त करवामां आवता, सहज, स्पर्शादिशून्य (स्पर्श, रस, गंध अने वर्णथी रहित) एवा आत्मप्रदेशोस्वरूप अमूर्तत्वशक्ति. २०. समस्त, कर्मथी करवामां आवता, ज्ञातृत्वमात्रथी जुदा जे परिणामो ते परिणामोना करणना *उपरमस्वरूप (ते परिणामोना करवानी निवृत्तिस्वरूप) अकर्तृत्वशक्ति.

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* उपरम = अटकवुं ते; निवृत्ति; अंत; अभाव.