पुद्गलकर्म बन्धं परिणमयन्ति । न चैतदप्रसिद्धं, पुरुषगृहीताहारस्योदराग्निना रसरुधिरमांसादिभावैः परिणामकरणस्य दर्शनात् ।
त्याज्यः शुद्धनयो न जातु कृतिभिः सर्वंक षः कर्मणाम् ।
पूर्ण ज्ञानघनौघमेकमचलं पश्यन्ति शान्तं महः ।।१२३।।
पर हेतुमान भावका ( – कार्यभावका) अनिवार्यत्व होनेसे, ज्ञानावरणादि भावसे पुद्गलकर्मको बन्धरूप परिणमित करते हैं । और यह अप्रसिद्ध भी नहीं है (अर्थात् इसका दृष्टान्त जगतमें प्रसिद्ध है — सर्व ज्ञात है); क्योंकि मनुष्यके द्वारा ग्रहण किये गये आहारका जठराग्नि रस, रुधिर, माँस इत्यादिरूपमें परिणमित करती है यह देखा जाता है ।
भावार्थ : — जब ज्ञानी शुद्धनयसे च्युत हो तब उसके रागादिभावोंका सद्भाव होता है, रागादिभावोंके निमित्तसे द्रव्यास्रव अवश्य कर्मबन्धके कारण होते हैं और इसलिये कार्मणवर्गणा बन्धरूप परिणमित होती है । टीकामें जो यह कहा है कि ‘‘द्रव्यप्रत्यय पुद्गलकर्मको बन्धरूप परिणमित कराते हैं ’’, सो निमित्तकी अपेक्षासे कहा है । वहाँ यह समझना चाहिए कि ‘‘द्रव्यप्रत्ययोंके निमित्तभूत होने पर कार्मणवर्गणा स्वयं बन्धरूप परिणमित होती है’’ ।१७९-१८०।
अब इस सर्व कथनका तात्पर्यरूप श्लोक कहते हैं : —
श्लोकार्थ : — [अत्र ] यहाँ [इदम् एव तात्पर्यं ] यही तात्पर्य है कि [शुद्धनयः न हि हेयः ] शुद्धनय त्यागने योग्य नहीं है; [हि ] क्योंकि [तत्-अत्यागात् बन्धः नास्ति ] उसके अत्यागसे (क र्मका) बन्ध नहीं होता और [तत्-त्यागात् बन्धः एव ] उसके त्यागसे बन्ध ही होता है ।१२२।
‘शुद्धनय त्याग करने योग्य नहीं है’ इस अर्थको दृढ करनेवाला काव्य पुनः कहते हैं : —
श्लोकार्थ : — [धीर-उदार-महिम्नि अनादिनिधने बोधे धृतिं निबध्नन् शुद्धनयः ] धीर (चलाचलता रहित) और उदार (सर्व पदार्थोंमें विस्तारयुक्त) जिसकी महिमा है ऐसे अनादिनिधन
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