(स्वागता) ज्ञानिनो न हि परिग्रहभावं कर्म रागरसरिक्त तयैति । रंगयुक्ति रकषायितवस्त्रे- ऽस्वीकृतैव हि बहिर्लुठतीह ।।१४८।।
(स्वागता)
सर्वरागरसवर्जनशीलः ।
कर्ममध्यपतितोऽपि ततो न ।।१४९।।
भावार्थ : — जो अध्यवसानके उदय संसार सम्बन्धी हैं और बन्धनके निमित्त हैं वे तो राग, द्वेष, मोह इत्यादि हैं तथा जो अध्यवसानके उदय देह सम्बन्धी हैं और उपभोगके निमित्त हैं वे सुख, दुःख इत्यादि हैं । वे सभी (अध्यवसानके उदय), नाना द्रव्योंके (अर्थात् पुद्गलद्रव्य और जीवद्रव्य जो कि संयोगरूप हैं, उनके) स्वभाव हैं; ज्ञानीका तो एक ज्ञायकस्वभाव है । इसलिये ज्ञानीके उनका निषेध है; अतः ज्ञानीको उनके प्रति राग – प्रीति नहीं है । परद्रव्य, परभाव संसारमें भ्रमणके कारण हैं; यदि उनके प्रति प्रीति करे तो ज्ञानी कैसा ?।।२१७।।
अब इस अर्थका कलशरूप और आगामी कथनका सूचक श्लोक कहते हैं : —
श्लोकार्थ : — [इह अकषायितवस्त्रे ] जैसे लोध और फि टकरी इत्यादिसे जोे कसायला नहीं किया गया हो ऐसे वस्त्रमें [रंगयुक्तिः ] रंगका संयोग, [अस्वीकृता ] वस्त्रके द्वारा अंगीकार न किया जानेसे, [बहिः एव हि लुठति ] ऊ पर ही लौटता है (रह जाता है) — वस्त्रके भीतर प्रवेश नहीं करता, [ज्ञानिनः रागरसरिक्ततया कर्म परिग्रहभावं न हि एति ] इसीप्रकार ज्ञानी रागरूप रससे रहित है, इसलिये कर्मोदयका भोग उसे परिग्रहत्वको प्राप्त नहीं होता ।
भावार्थ : — जैसे लोध और फि टकरी इत्यादिके लगाये बिना वस्त्रमें रंग नहीं चढ़ता उसीप्रकार रागभावके बिना ज्ञानीके कर्मोदयका भोग परिग्रहत्वको प्राप्त नहीं होता ।१४८।
अब पुनः कहते हैं कि : —
श्लोकार्थ : — [यतः ] क्योंकि [ज्ञानवान् ] ज्ञानी [स्वरसतः अपि ] निज रससे ही [सर्वरागरसवर्जनशीलः ] सर्व रागरसके त्यागरूप स्वभाववाला [स्यात् ] है, [ततः ] इसलिये
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