जह णाम को वि पुरिसो णेहब्भत्तो दु रेणुबहुलम्मि । ठाणम्मि ठाइदूण य करेदि सत्थेहिं वायामं ।।२३७।। छिंददि भिंददि य तहा तालीतलकयलिवंसपिंडीओ । सच्चित्ताचित्ताणं करेदि दव्वाणमुवघादं ।।२३८।। उवघादं कुव्वंतस्स तस्स णाणाविहेहिं करणेहिं । णिच्छयदो चिंतेज्ज हु किंपच्चयगो दु रयबंधो ।।२३९।। जो सो दु णेहभावो तम्हि णरे तेण तस्स रयबंधो । णिच्छयदो विण्णेयं ण कायचेट्ठाहिं सेसाहिं ।।२४०।। एवं मिच्छादिट्ठी वट्टंतो बहुविहासु चिट्ठासु ।
भावार्थ : — बन्धतत्त्वने ‘रंगभूमिमें’ प्रवेश किया है, उसे दूर करके जो ज्ञान स्वयं प्रगट होकर नृत्य करेगा, उस ज्ञानकी महिमा इस काव्यमें प्रगट की गई है । ऐसे अनन्त ज्ञानस्वरूप जो आत्मा वह सदा प्रगट रहो ।१६३।
अब बन्धतत्त्वके स्वरूपका विचार करते हैं; उसमें पहिले बन्धके कारणको स्पष्टतया बतलाते हैं : —