दुक्खिदसुहिदे सत्ते करेमि जं एवमज्झवसिदं ते । तं पावबंधगं वा पुण्णस्स व बंधगं होदि ।।२६०।। मारिमि जीवावेमि य सत्ते जं एवमज्झवसिदं ते । तं पावबंधगं वा पुण्णस्स व बंधगं होदि ।।२६१।।
य एवायं मिथ्याद्रष्टेरज्ञानजन्मा रागमयोऽध्यवसायः स एव बन्धहेतुः इत्यव- अध्यवसाय ही बन्धका कारण है ऐसा नियमसे कहते हैं ) : —
गाथार्थ : — ‘[सत्त्वान् ] जीवोंको मैं [दुःखितसुखितान् ] दुःखी-सुखी [करोमि ] करता हूँ’ [एवम् ] ऐसा [यत् ते अध्यवसितं ] जो तेरा १अध्यवसान, [तत् ] वही [पापबन्धकं वा ] पापका बन्धक [ पुण्यस्य बन्धकं वा ] अथवा पुण्यका बन्धक [भवति ] होता है ।
‘[ सत्त्वान् ] जीवोंको मैं [मारयामि च जीवयामि ] मारता हूँ और जिलाता हूँ ’ [एवम् ] ऐसा [यत् ते अध्यवसितं ] जो तेरा अध्यवसान, [तत् ] वही [पापबन्धकं वा ] पापका बन्धक [पुण्यस्य बन्धकं वा ] अथवा पुण्यका बन्धक [भवति ] होता है ।
टीका : — मिथ्यादृष्टिके अज्ञानसे उत्पन्न होनेवाला जो यह रागमय अध्यवसाय है वही
१जो परिणमन मिथ्या अभिप्राय सहित हो ( – स्वपरके एकत्वके अभिप्रायसे युक्त हो) अथवा वैभाविक हो, उस परिणमनके लिए ‘अध्यवसान’ शब्द प्रयुक्त होता है । (मिथ्या) निश्चय अथवा (मिथ्या) अभिप्राय करनेके अर्थमें भी ‘अध्यवसान’ शब्द प्रयुक्त होता है ।