जानन्नपि न मुच्यते मुच्यते स चैव यदि शुद्धः ।।२९०।।
भावार्थ : — ज्ञान बन्ध और पुरुषको पृथक् करके, पुरुषको मोक्ष पहुँचाता हुआ, अपनासम्पूर्ण स्वरूप प्रगट करके जयवन्त प्रवर्तता है । इसप्रकार ज्ञानकी सर्वोत्कृष्टताका कथन हीमंगलवचन है ।१८०।
अब, मोक्षकी प्राप्ति कैसे होती है सो कहते हैं । उसमें प्रथम तो, यह कहते हैं कि, जोजीव बन्धका छेद नहीं करता, किन्तु मात्र बन्धके स्वरूपको जाननेसे ही सन्तुष्ट है वह मोक्ष प्राप्त नहीं करता : —
ज्यों पुरुष कोई बन्धनों, प्रतिबद्ध है चिरकालका ।
वह तीव्र-मन्द स्वभाव त्यों ही काल जाने बन्धका ।।२८८।।
पर जो करे नहिं छेद तो छूटे न, बन्धनवश रहे ।
अरु काल बहुतहि जाय तो भी मुक्त वह नर नहिं बने ।।२८९।।