Samaysar (Hindi).

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कहानजैनशास्त्रमाला ]
मोक्ष अधिकार
४४७

देस्तदपोहकत्वेनामृतकुम्भत्वात् उक्तं च व्यवहाराचारसूत्रे‘‘अप्पडिकमणमप्पडिसरणं अप्परिहारो अधारणा चेव अणियत्ती य अणिंदागरहासोही य विसकुंभो ।।१।। पडिकमणं पडिसरणं परिहारो धारणा णियत्ती य णिंदा गरहा सोही अट्ठविहो अमयकुंभो दु ।।२।।’’

अत्रोच्यते अपराधको दूर करनेवाले होनेसे, अमृतकुम्भ हैं व्यवहारका कथन करनेवाले आचारसूत्रमें भी कहा है कि :

अप्पडिकमणमपडिसरणं अप्पडिहारो अधारणा चेव
अणियत्ती य अणिंदागरहासोही य विसकुम्भो ।।१।।
पडिकमणं पडिसरणं परिहारो धारणा णियत्ती य
णिंदा गरहा सोही अट्ठविहो अमयकुम्भो दु ।।२।।

[अर्थ :अप्रतिक्रमण, अप्रतिसरण, अपरिहार, अधारणा, अनिवृत्ति, अनिन्दा, अगर्हा और अशुद्धियह (आठ प्रकारका) विषकुम्भ है ।१।

प्रतिक्रमण, प्रतिसरण, परिहार, धारणा, निवृत्ति, निन्दा, गर्हा और शुद्धियह आठ प्रकारका अमृतकुम्भ है ।२।]

उपरोक्त तर्कका समाधान करते हुए आचार्यदेव (निश्चयनयकी प्रधानतासे) गाथा द्वारा कहते हैं :

१. प्रतिक्रमण = कृत दोषोंका निराकरण

२. प्रतिसरण = सम्यक्त्वादि गुणोंमें प्रेरणा

३. परिहार = मिथ्यात्वादि दोषोंका निवारण

४. धारणा = पंचनमस्कारादि मंत्र, प्रतिमा इत्यादि बाह्य द्रव्योंके आलम्बन द्वारा चित्तको स्थिर करना

५. निवृत्ति = बाह्य विषयकषायादि इच्छामें प्रवर्तमान चित्तको हटा लेना

६. निन्दा = आत्मसाक्षीपूर्वक दोषोंका प्रगट करना

७. गर्हा = गुरुसाक्षीसे दोषोंका प्रगट करना

८. शुद्धि = दोष होने पर प्रायश्चित्त लेकर विशुद्धि करना