ण कुदोचि वि उप्पण्णो जम्हा कज्जं ण तेण सो आदा । उप्पादेदि ण किंचि वि कारणमवि तेण ण स होदि ।।३१०।। कम्मं पडुच्च कत्ता कत्तारं तह पडुच्च कम्माणि ।
गाथार्थ : — [यत् द्रव्यं ] जो द्रव्य [गुणैः ] जिन गुणोंसे [उत्पद्यते ] उत्पन्न होता है, [तैः ] उन गुणोंसे [तत् ] उसे [अनन्यत् जानीहि ] अनन्य जानो; [यथा ] जैसे [इह ] जगतमें [कटकादिभिः पर्यायैः तु ] क ड़ा इत्यादि पर्यायोंसे [कनकम् ] सुवर्ण [अनन्यत् ] अनन्य है वैसे ।
[जीवस्य अजीवस्य तु ] जीव और अजीवके [ये परिणामाः तु ] जो परिणाम [सूत्रे दर्शिताः ] सूत्रमें बताये हैं, [तैः ] उन परिणामोंसे [तं जीवम् अजीवम् वा ] उस जीव अथवा अजीवको [अनन्यं विजानीहि ] अनन्य जानो ।
[यस्मात् ] क्योंकि [कुतश्चित् अपि ] किसीसे भी [न उत्पन्नः ] उत्पन्न नहीं हुआ, [तेन ] इसलिये [सः आत्मा ] वह आत्मा [कार्यं न ] (किसीका) कार्य नहीं है, [किञ्चित् अपि ] और किसीको [न उत्पादयति ] उत्पन्न नहीं करता, [तेन ] इसलिये [सः ] वह [कारणम् अपि ] (किसीका) कारण भी [न भवति ] नहीं है ।