लोयस्स कुणदि विण्हू सुरणारयतिरियमाणुसे सत्ते । समणाणं पि य अप्पा जदि कुव्वदि छव्विहे काए ।।३२१।। लोयसमणाणमेयं सिद्धंतं जइ ण दीसदि विसेसो । लोयस्स कुणइ विण्हू समणाण वि अप्पओ कुणदि ।।३२२।। एवं ण को वि मोक्खो दीसदि लोयसमणाण दोण्हं पि ।
— जो देव, मानव, असुरके त्रयलोकको नित्य हि करे ।।३२३।।
गाथार्थ : — [लोकस्य ] लोक के (लौकि क जनोंके) मतमें [सुरनारकतिर्यङ्मानुषान् सत्त्वान् ] देव, नारकी , तिर्यंच, मनुष्य — प्राणियोंको [विष्णुः ] विष्णु [करोति ] क रता है; [च ] और [यदि ] यदि [श्रमणानाम् अपि ] श्रमणों-(मुनियों)के मन्तव्यमें भी [षडिवधान् कायान् ] छह कायके जीवोंको [आत्मा ] आत्मा [करोति ] क रता हो, [यदि लोकश्रमणानाम् ] तो लोक और श्रमणोंका [एकः सिद्धान्तः ] एक सिद्धांत हो गया, [विशेषः न दृश्यते ] उनमें कोई अन्तर दिखाई नहीं देता; (क्योंकि) [लोकस्य ] लोक के मतमें [विष्णुः ] विष्णु [करोति ] क रता है और
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