ववहारभासिदेण दु परदव्वं मम भणंति अविदिदत्था । जाणंति णिच्छएण दु ण य मह परमाणुमित्तमवि किंचि ।।३२४।। जह को वि णरो जंपदि अम्हं गामविसयणयररट्ठं । ण य होंति तस्स ताणि दु भणदि य मोहेण सो अप्पा ।।३२५।। एमेव मिच्छदिट्ठी णाणी णीसंसयं हवदि एसो । जो परदव्वं मम इदि जाणंतो अप्पयं कुणदि ।।३२६।। तम्हा ण मे त्ति णच्चा दोण्ह वि एदाण कत्तविवसायं ।
परद्रव्यका कर्तृत्व कैसे हो सकता है ? २००।
अब, ‘‘जो व्यवहारनयके कथनको ग्रहण करके यह कहते हैं कि ‘परद्रव्य मेरा है’, और इसप्रकार व्यवहारको ही निश्चय मानकर आत्माको परद्रव्यका कर्ता मानते हैं, वे मिथ्यादृष्टि हैं’’ इत्यादि अर्थकी सूचक गाथायें दृष्टान्त सहित कहते हैं : —
गाथार्थ : — [अविदितार्थाः ] जिन्होंने पदार्थके स्वरूपको नहीं जाना है, ऐसे पुरुष
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