जह परदव्वं सेडदि हु सेडिया अप्पणो सहावेण । तह परदव्वं विजहदि णादा वि सएण भावेण ।।३६३।। जह परदव्वं सेडदि हु सेडिया अप्पणो सहावेण । तह परदव्वं सद्दहदि सम्मदिट्ठी सहावेण ।।३६४।। एवं ववहारस्स दु विणिच्छओ णाणदंसणचरित्ते ।
गाथार्थ : — (यद्यपि व्यवहारसे परद्रव्योंका और आत्माका ज्ञेय-ज्ञायक , दृश्य-दर्शक , त्याज्य-त्याजक इत्यादि सम्बन्ध है, तथापि निश्चयसे तो इसप्रकार है : — ) [यथा ] जैसे [सेटिका तु ] खड़िया मिट्टी या पोतनेका चूना या कलई [परस्य न ] परकी ( – दीवाल आदिकी) नहीं है, [सेटिका ] कलई [सा च सेटिका भवति ] वह तो कलई ही है, [तथा ] उसीप्रकार [ज्ञायकः तु ] ज्ञायक (जाननेवाला, आत्मा) [परस्य न ] परका (परद्रव्यका) नहीं है, [ज्ञायकः ] ज्ञायक [सः तु ज्ञायकः ] वह तो ज्ञायक ही है । [यथा ] जैसे [सेटिका तु ] कलई [परस्य न ] परकी नहीं है, [सेटिका ] कलई [सा च सेटिका भवति ] वह तो कलई ही है, [तथा ] उसीप्रकार
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