घातस्य, पुद्गलद्रव्यघाते तद्घातस्य दुर्निवारत्वात् । यत एवं ततो ये यावन्तः केचनापि जीवगुणास्ते सर्वेऽपि परद्रव्येषु न सन्तीति सम्यक् पश्यामः, अन्यथा अत्रापि जीवगुणघाते पुद्गलद्रव्यघातस्य, पुद्गलद्रव्यघाते जीवगुणघातस्य च दुर्निवारत्वात् । यद्येवं तर्हि कुतः सम्यग्द्रष्टेर्भवति रागो विषयेषु ? न कुतोऽपि । तर्हि रागस्य कतरा खानिः ? रागद्वेषमोहा हि जीवस्यैवाज्ञानमयाः परिणामाः, ततः परद्रव्यत्वाद्विषयेषु न सन्ति, अज्ञानाभावात्सम्यग्द्रष्टौ तु न भवन्ति । एवं ते विषयेष्वसन्तः सम्यग्द्रष्टेर्न भवन्तो, न भवन्त्येव । पुद्गलद्रव्यका नाश नहीं होता (यह तो स्पष्ट है); इसलिये इसप्रकार यह सिद्ध होता है कि – ‘दर्शन-ज्ञान-चारित्र पुद्गलद्रव्यमें नहीं हैं’ क्योंकि, यदि ऐसा न हो तो दर्शन-ज्ञान-चारित्रका घात होने पर पुद्गलद्रव्यका घात, और पुद्गलद्रव्यके घात होने पर दर्शन-ज्ञान-चारित्रका अवश्य ही घात होना चाहिये। ऐसा होनेसे जीवके जो जितने गुण हैं वे सब परद्रव्योंमें नहीं हैं यह इस भलीभांति देखते-मानते हैं; क्योंकि, यदि ऐसा न हो तो, यहाँ भी जीवके गुणोंका घात होने पर पुद्गलद्रव्यका घात, और पुद्गलद्रव्यके घात होने पर जीवके गुणका घात होना अनिवार्य हो जाय। (किन्तु ऐसा नहीं होता, इससे सिद्ध हुआ कि जीवके कोई गुण पुद्गलद्रव्यमें नहीं हैं।)
प्रश्न : — यदि ऐसा है तो सम्यग्दृष्टिको विषयोंमें राग किस कारणसे होता है ? उत्तर : — किसी भी कारणसे नहीं होता। (प्रश्न : — ) तब फि र रागकी खान (उत्पत्ति स्थान) कौनसी है ? (उत्तर : — ) राग-द्वेष-मोह, जीवके ही अज्ञानमय परिणाम हैं (अर्थात् जीवका अज्ञान ही रागादिको उत्पन्न करनेकी खान है); इसलिये वे राग-द्वेष-मोह, विषयोंमें नहीं हैं, क्योंकि विषय परद्रव्य हैं, और वे सम्यग्दृष्टिमें (भी) नहीं हैं क्योंकि उसके अज्ञानका अभाव है; इसप्रकार राग- द्वेष-मोह, विषयोंमें न होनेसे और सम्यग्दृष्टिके (भी) न होनेसे, (वे) हैं ही नहीं।
भावार्थ : — आत्माके अज्ञानमय परिणामरूप राग-द्वेष-मोह उत्पन्न होने पर आत्माके दर्शन-ज्ञान-चारित्रादि गुणोंका घात होता है, किन्तु गुणोंके घात होने पर भी अचेतन पुद्गलद्रव्यका घात नहीं होता; और पुद्गलद्रव्यके घात होने पर दर्शन-ज्ञान-चारित्रादिका घात नहीं होता; इसलिये जीवके कोई भी गुण पुद्गलद्रव्यमें नहीं हैं। ऐसा जानते हुए सम्यग्दृष्टिको अचेतन विषयोंमें रागादिक नहीं होते। राग-द्वेष-मोह, पुद्गलद्रव्यमें नहीं हैं, वे जीवके ही अस्तित्वमें अज्ञानसे उत्पन्न होते हैं; जब अज्ञानका अभाव हो जाता है अर्थात् सम्यग्दृष्टि होता है, तब राग-द्वेषादि उत्पन्न होते हैं। इसप्रकार राग-द्वेष-मोह न तो पुद्गलद्रव्यमें हैं और न सम्यग्दृष्टिमें भी होते हैं, इसलिये शुद्धद्रव्यदृष्टिसे देखने पर वे हैं ही नहीं, और पर्यायदृष्टिसे देखने पर वे जीवको अज्ञान अवस्थामें हैं। ऐसा जानना चाहिये।।३६६ से ३७१।।
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