Shastra Swadhyay-Gujarati (Devanagari transliteration).

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श्री दिगंबर जैन स्वाध्यायमंदिर टस्ट, सोनगढ -
सम्यक्त्वथी सुज्ञान, जेथी सर्व भाव जणाय छे,
ने सौ पदार्थो जाणतां अश्रेय-श्रेय जणाय छे. १५.
अश्रेय-श्रेयसुजाण छोडी कुशील धारे शीलने,
ने शीलफळथी होय अभ्युदय, पछी मुक्ति लहे. १६.
जिनवचनरूप दवा विषयसुखरेचिका, अमृतमयी,
छे व्याधि-मरण-जरादिहरणी, सर्व दुःखविनाशिनी. १७.
छे एक जिननुं रूप, बीजुं श्रावकोत्तम-लिंग छे,
त्रीजुं कह्युं आर्यादिनुं, चोथुं न कोई कहेल छे. १८.
पंचास्तिकाय, छ द्रव्य ने नव अर्थ, तत्त्वो सात छे,
श्रद्धे स्वरूपो तेमनां, जाणो सुद्रष्टि तेहने. १९.
जीवादिना श्रद्धानने सम्यक्त्व भाख्युं छे जिने
व्यवहारथी, पण निश्चये आत्मा ज निज सम्यक्त्व छे. २०.
ए जिनकथित दर्शनरतनने भावथी धारो तमे,
गुणरत्नत्रयमां सार ने जे प्रथम शिवसोपान छे. २१.
थई जे शके करवुं अने नव थइ शके ते श्रद्धवुं;
सम्यक्त्व श्रद्धावंतने सर्वज्ञ जिनदेवे कह्युं. २२.
द्रग, ज्ञान ने चारित्र, तप, विनये सदाय सुनिष्ठ जे,
ते जीव वंदनयोग्य छेगुणधर तणा गुणवादी जे. २३.
१. अभ्युदय = तीर्थंकरत्वादिनी प्राप्ति.
२. विषयसुखरेचिका = विषयसुखनुं विरेचन करनारी.
३. जिननुं रूप = जिनना रूप समान मुनिनुं यथाजात रूप.
४. प्रथम शिवसोपान = मोक्षनुं पहेलुं पगथियुं.
५. सुनिष्ठ = सुस्थित.
६. गुणधर = गुणना धरनारा.
७. गुणवादी = गुणोने प्रकाशनारा.
अष्टप्राभृत-दर्शनप्राभृत ]
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