११४ ][ श्री जिनेन्द्र
निशदिन जपूं मैं श्री वीर प्यारा,
आके लिया है तेरे दरका सहारा...हटाना...ना...२
आवागमनसे हमें अब छुडा दो,
‘पंकज’ की नैया किनारे लगादो...डुबाना...ना....३
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श्री जिनेन्द्र स्तवन
(राग – गोपीचंदका)
छबि नयन पियारी जी, देखत मन मोहे मूरत आपकी
श्याम वरन और सुंदर मूरत सिंहासन के मांहीं.... — म्हारा प्रभुजी सिंहासन के मांहीं;
सिंहासन के मांही के मूरत सोहनी
निरत करत है सखी सभा मन मोहनी...छबि० १
ठाडो इन्दर नृत्य करत है देख रहे नरनार;
— म्हारा प्रभुजी देख रहे नरनार;
देख रहे नर नार के मनमें चाव है
घुंघरु ताल मृदंग और बीन बजाय है....छबि० २
ठाडो सेवक अरज करत है सुनो गरीब निवाज.....;
— म्हारा प्रभुजी सुने गरीब निवाज;
सुनो गरीब निवाज के थ्यांवश दीजिये
आन पड्यो हूं दुःख दूर कर दीजिये......छबि.....३
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