भजनमाळा ][ ११५
श्री जिनेन्द्र – समवसरण स्तुति
(राग - श्याम कल्याण)
आज कोई अद्भुत रचना रची....
जुगल इन्द्र दोउ चंवर ढूरावत, निरत करत है शची....आज० १
समवसरन महिमा देखन की होडाहोड मची....आज० २
स्वर्ग विमान तुल्य छबि जा के देखत मन न खची....आज० ३
जिन गुण सारख सब इनमें ये जिन जात खची....आज० ४
नवल कहे उर आवत ऐसे हर्ष धार के नची....आज० ५
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श्री जिनेन्द्र देव स्तवन
(आशावरीः आज मैं परम पदारथ पायो....)
आज जिन चरन...शरन....हम पायो....
आनंद उर न समायो....आज जिन चरन शरन हम पायो....
अशुभ गये शुभ प्रगट भये है, निज पर भेद लखायो,
जड सपरस-रस-गंध-वरण मय तिनतैं ममत तुडायो...आज० १
जीव चेतना ज्ञान मयी है ताको पार न पायो,
लोकालोक चराचर दर्शत दर्पण सम झलकायो...आज० २
ज्ञान अनंत दर्श सुख वीरज देखत मन ललचायो,
ये जिन महिमा सुनत झौंहरी मन वच शीश नमायो...आज० ३
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