Shri Jinendra Bhajan Mala-Gujarati (Devanagari transliteration).

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११६ ][ श्री जिनेन्द्र
श्री जिनेन्द्रभजन
(लवाणी मेरठी)
तुम बिन मेरा तीन लोक में वाली वारस ना कोई.....
जो दीखे सो सकल विनश्वर वसु विधि वस दीखे सोई...तुम० १
कांपे जाउ, दीखे ना कोई पराधीनता बिन जोई,
ज्यां सागर बीच नौका पंछी पर शरणा बिन में सोई...तुम० २
मैं तुम बिन भटक्यो दुःख भोगे तुमतें छानी ना कोई,
अब मम दुःख मेटी सुख दीजे यातें शरण ग्रही तोरी....तुम० ३
तन धन जोबन दगाबाज है निर्णय कर लीनो यों ही,
पर परिणति तज निज परिणति लहू वर मांगुं पारस योही तुम०
श्री जिनेन्द्र स्तवन
हो महाराजा स्वामी, थे तो म्हाने त्यारो म्हाका राज (टेक)
थे ही तारन तरन छोजी थे छो गरीब निवाज,
अधम उधारन जानके शरणें आया री लाज....हो०
जीव अनंता त्यारिया जा को अंत न पार,
अधम उदधि तिरजंच के बहुत किये भवपार....हो०
ऐसी सुनकर साख तिहारी आयो छुं दरबार,
भवदधि डुबत काढ मोकुं शरणे आया की लाज...हो०
अरज करुं कर जोर के विनवुं वारमवार,
बलदेव प्रभु है दास तिहारो दीजो शिवपुरवास....हो०