समो सरण दरबार आजे समोसरण दरबारजी......
त्रण भुवनना नाथ पधार्या, पधार्या सीमंधर नाथजी......
केवळज्ञान गुणाकर प्रगट्या, प्रगट्या चैतन्य देवजी......
ॐकार ध्वनिना धोध छूट्या, ऊछळ्या समुद्र अपारजी......
इंद्रोए मळी उत्सव कीनो, घरघर मंगलाचारजी......
घनघन घनघन घंटा वागे, देव करे जयकारजी......
सुवर्णपुरे समोसरण पधार्या जिनेन्द्र दरबारजी......
जिनवर वैभव आज निहाळी हैडा हरखी जायजी......
अष्ट भूमिनी शोभा अद्भुत, महिमानो नहि पारजी......
सभा भूमिमां मुनि अर्जिका, सुरपति नरपति वृंदजी......
लयलीन बन्या सहु प्रभु ध्वनिमां अंतर आतम ऊछळ्याजी......
श्री तीर्थंकर वैभव केरा गुणो केम गवायजी......
त्रण भुवनमां महिमा तारी महिमाना भंडारजी......
स्वर्ग पुरीथी इंद्रो आवे नृत्य करे जयकारजी......
कहानगुरुना परम प्रभावे समोसरण नीहाळ्याजी......
कहानगुरुए रहस्य खोल्यां खोल्या मुक्ति मारगजी......
सेवकने प्रभु शरणे राखो ए ज अरज दिनरातजी......